एक राजा की एक महात्मा पर श्रद्धा हो गई। एक दिन राजा ने संत से सेवा का महत्व सुना, तो अपने ढंग से सेवा करने में वह जुट गए। उन्होंने महात्मा के लिए अपने राजभवन के समान भवन बनवाया। अपने उद्यान जैसा मोहक उद्यान लगवाया। महात्मा की सेवा में उन्होंने अपनी सवारियों जैसी सवारियां, हाथी, घोड़े आदि रख दिए। इसके अतिरिक्त सेवक, शय्या, वस्त्र एवं दूसरी सब सुख-सुविधाएं उन्होंने महात्मा के लिए वैसी ही जुटा दीं, जैसी उनके पास थी।
एक दिन राजा महात्मा के साथ घूमने निकले। उन्होंने पूछ लिया, भगवन, अब आपमें और मुझमें अंतर क्या रहा? संत ने समझ लिया कि राजा भौतिक सुख-सुविधा को महत्ता देकर यह प्रश्न कर रहे हैं, किंतु प्रश्न का उत्तर न देकर बोले, तनिक आगे चलो, फिर बताऊंगा।
चलते-चलते काफी देर हो गई। महात्मा रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, जबकि राजा थक चुके थे। उन्होंने हाथ जोड़कर पूछा, भगवन, कितनी दूर चलेंगे। अब लौटना चाहिए। हमलोग नगर से दूर निकल आए हैं। संत ने जवाब दिया, अब लौटकर ही क्या करना है? मेरी इच्छा तो लौटने की है नहीं। चलो, वन में चलें। वहां भगवान का भजन करेंगे। सुख तो बहुत दिन भोग चुके।
राजा ने घबराकर हाथ जोड़े और कहा, भगवन, मेरा परिवार है, बीवी है, बच्चे हैं और राज्य की भी मैंने कोई व्यवस्था नहीं की है। वन में रहने जैसा साहस भी अभी मुझ में नहीं है। मैं इस प्रकार कैसे चल सकता हूं? यह सुनकर संत हंसे और कहा, राजन, मुझमें और तुम में यही अंतर है। बाहर से एक जैसा व्यवहार रहते हुए भी हृदय का अंतर ही मुख्य अंतर होता है। भोगों से जो आसक्त रहता है, वह वन में रहकर भी संसारी है, और जो उनमें आसक्त नहीं, वह घर में रहकर भी विरक्त है।