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आखिर होशियार और ज्ञानी बच्चे बड़े होकर असफल कैसे हो जाते हैं?

Thu, 28 Aug 2014 11:26 AM IST
चीन की एक किंवदंती
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चीन के झियांग इलाके में बड़ी अराजकता छाई हुई थी। वहां के दार्शनिक कन्फ्यूशियस तब अपने शिष्यों के साथ लंबी यात्रा पर निकले। इस यात्रा का मकसद अराजकता का हल ढूंढना नहीं था। मगर कोई मौका मिलता, तो उस पर बात जरूर की जाती थी।
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एक दिन किसी गांव में रहनेवाले एक बुद्धिमान बालक के बारे में कन्फ्यूशियस ने सुना। वह तुरंत उससे मिलने जा पहुंचे। उन्होंने बालक से पूछा, दुनिया में बहुत असमानताएं और भेदभाव हैं। इन्हें हम किस प्रकार दूर कर सकते हैं?

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लेकिन ऐसा करने की जरूरत ही क्या है, उस बालक ने जवाब दिया। थोड़ा रुककर वह फिर बोला, यदि हम पर्वतों को तोड़कर समतल कर दें, तो पक्षी कहां रहेंगे? यदि हम नदियों और सागर को पाट दें, तो मछलियां कैसे जीवित रहेंगी?
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दुनिया इतनी विशाल है कि इन असमानताओं का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह अपने हिसाब से चलती ही रहती है। जो चीजें किसी हिसाब से चलती रहती है, उसे बदलने पर दिक्कतें ही पेश आएंगी।

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कन्फ्यूशियस के शिष्य उस बालक की बात सुनकर बहुत प्रभावित हुए। पर कन्फ्यूशियस ने कहा, बहुत से बच्चे देखे हैं, जो खेलने-कूदने में मन लगाने के बजाय दुनिया को समझने की कोशिश करते हैं। उन प्रतिभाशाली बच्चों ने आगे जाकर अपने जीवन में कुछ खास नहीं किया। यह कहकर कन्फ्यूशियस ने शिष्यों से पूछा, क्या तुम्हे ऐसा कोई व्यक्ति याद है, जो बचपन की प्रतिभा को बरकरार रख सका हो।

शिष्य काफी देर तक सिर खु़जाते रहे। उनके थक जाने पर गुरु ने कहा, ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं मिलेगा। वजह सिर्फ यह है कि उन्होंने अपने बचपन की सरलता और सहज अनुत्तरदायित्व का कोई अनुभव नहीं किया।
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