एक युवक अपने गुरु के पास वर्षों तक रहा। गुरु ने कभी उसे कुछ कहा नहीं। बार-बार वह पूछता, मुझे कुछ कहें, आदेश दें, मैं क्या करूं? गुरु कहते, मुझे देखो। मैं जो करता हूं, वैसा करो। मैं जो नहीं करता, वह मत करो। एक दिन शिष्य ने कहा, मेरी समझ में कुछ नहीं आता।
आप मुझे कहीं और भेज दें। गुरु ने कहा, तू जा, पास में एक सराय है, चौबीस घंटे वहां ठहरना और सराय के मालिक को सिर्फ देखते रहना। उससे तुझे ज्ञान की प्राप्ति होगी। वह बेमन से गया। उसने सोचा, गुरु से जब ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई, तो सराय के मालिक से कैसे ज्ञान मिलेगा!
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गंतव्य स्थान पर पहुंचकर उसने देखा कि धर्मशाला का मालिक दिनभर धूल झाड़ता रहा। आधी रात को देखा, तो वह बर्तन साफ कर रहा था। शिष्य सुबह जब उठा, तो भी देखा कि वह फिर बर्तन साफ कर रहा था। साफ किए बर्तन ही साफ कर रहा था।
उसने सराय के मालिक से पूछा कि साफ किए बर्तन अब किसलिए साफ कर रहे हैं? मालिक ने कहा, रातभर बर्तन बिना उपयोग के रखे रहें, तो धूल जम जाती है। उपयोग करने से उस पर धूल नहीं जमती। शिष्य वापस चला आया गुरु के पास। कहने लगा वहां क्या सीखने में रखा है।
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वह आदमी तो हद दर्जे का पागल है। वह तो बर्तनों को ही घिसता रहता है। रात बारह बजे तक वह बर्तनों को घिसता रहा, फिर सुबह पांच बजे से उसने बर्तन घिसना शुरू किया। वह तो घिसे-घिसाए बर्तनों को घिसता है। गुरु ने कहा, यही तू कर, नासमझ! इसीलिए तुझे वहां भेजा था। अपने आपको निरंतर घिसता मांजता रह, क्योंकि समय के साथ हमारे सपनों पर भी धूल जम जाती है। इस धूल को साफ करके ही हम अपने सपनों को साकार कर सकते हैं।