श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है, यज्ञ करो, देवताओं को तृप्त करो, तो देवता भी तुम्हें तृप्त करेंगे। यज्ञ से तृप्त देवता प्रकृति के रूप में बिना मांगे ही इच्छित भोग देते रहेंगे।
महर्षि याज्ञवल्क्य जी ने लिखा है, जो ईमानदारी से अर्जित धन को सत्कर्मों में खर्च करता है या उस धन का इस्तेमाल धर्म-कर्म व सेवा-परोपकार में करता है, उसे असंख्य गुना धन प्रभु प्रदान करते हैं। ईसा शिष्यों से हमेशा कहा करते थे, जो भी अर्जित करो, बांटकर खाओ। धन-संपत्ति पर अपना हक न समझो।
विचारक लेखक धर्मेंद्र देव आत्मा का अर्थशास्त्र में लिखते हैं, एक भट्ठे से आठ भट्ठे बन गए। उनमें तैयार ईंटों से असंख्य अट्टालिकाएं खड़ी हो गईं, किंतु जिन पथेरों ने जीवन-भर ईंटें पाथीं, क्या उनमें से एक का भी अच्छा घर बन पाया? बड़ा-बड़ा मकान बनाने वाला मजदूर अंतिम श्वास जर्जर झोंपड़ी में लेता है, यह भौतिक अर्थशास्त्र का परिणाम है।
जो भी संपत्ति है, वह मेरी नहीं, भगवान की है। उसका उपयोग समाज के लिए, सत्कर्मों और सेवा-परोपकार के लिए है-भारतीय संस्कृति का यह सूत्र आत्मा के अर्थशास्त्र का एक नमूना है। धर्मेंद्र देव जी लिखते हैं, बांटने से अधिक भागीदार बनाओ, दुखी जनों को सुखी बनाओ, रोगियों को दवा-चिकित्सक उपलब्ध कराओ, इसे ही आत्मा का अर्थशास्त्र कहते हैं। देने-बांटने से खजाना कभी खाली नहीं होता।