भगिनी निवेदिता ने एक दिन देखा कि स्वामी विवेकानंद कह रहे थे कि बेसहारा अनाथ बच्चे साक्षात भगवान के समान हैं। यह सुनकर भगिनी निवेदिता ने संकल्प ले लिया कि वह बंगाल में अनाथ बच्चों के कल्याण के लिए एक आश्रम की स्थापना करेंगी। इसके लिए वह कोलकाता के धनाढ्यों के पास पहुंचकर आश्रम के लिए दान मांगने लगीं।
एक दिन वह किसी ऐसे सेठ के पास जा पहुंची, जो कंजूस था। उसने कहा, मैंने मेहनत से एक-एक पैसा जोड़ा है। आश्रम-वाश्रम में दान क्यों दूं? फिर भी निवेदिता बार-बार कुछ देने का आग्रह करती रहीं।
इससे सेठ आपा खो बैठा और उसने भगिनी निवेदिता को थप्पड़ जड़ दिया। थप्पड़ खाकर भी युवती ने धैर्य से कहा, आपने मुझे थप्पड़ दिया, इसे मैं स्वीकार करती हूं। अब अनाथ बच्चों के लिए भी तो कुछ दीजिए।
भगिनी निवेदिता की सहनशीलता और समर्पण देख सेठ अपने कृत्य पर पछताने लगा। उसने आलमारी से रकम निकालकर उन्हें भेंट कर दी।