श्रीराम कथा की विशिष्ट काव्य शैली में रचना करनेवाले पंडित राधेश्याम कथावाचक संत-महात्माओं के सत्संग के लिए लालायित रहा करते थे। प्रभुदत्त ब्रह्मचारी की प्रेरणा से उन्होंने महामना पंडित मदनमोहन मालवीय को अपना गुरु बनाया था।
मालवीय जी के श्रीमुख से भागवत कथा सुनकर पंडित राधेश्याम भाव-विभोर हो उठते थे। मालवीय जी को भी राधेश्याम जी की लिखी रामायण का गायन सुनकर अनूठी तृप्ति मिलती थी।
पढ़ें,उस समय लड़कियां रखें बाल खोलकर, मिलता है वैवाहिक जीवन का सुख
एक बार गुरु पूर्णिमा के अवसर पर पंडित राधेश्याम ने संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी के साथ काशी पहुंचकर अपने गुरु मालवीय जी को एक कीमती शॉल व मिठाइयां भेंट कीं। मालवीय जी को आग्रहपूर्वक शॉल ओढ़ाई गई। यह शॉल उन्होंने विशेष रूप से गुरु दक्षिणा के लिए तैयार करवाई थी।
पढ़ें,शादी के बाद खुलेगी किस्मत, पैर के नाखून देखकर चुनें जीवनसाथी
कुछ समय बाद अचानक हिंदू विश्वविद्यालय के दक्षिण भारतीय संस्कृत शिक्षक मालवीय जी के दर्शन के लिए आ पहुंचे। मालवीय जी उनके विरक्त व तपस्वी जीवन से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने शिक्षक की ओर संकेत कर राधेश्याम कथावाचक से कहा, इन्होंने कठोर साधना कर असंख्य छात्रों को देववाणी और धर्मशास्त्रों का अध्ययन कराया है। ऐसे तपस्वी शिक्षक हमारे आदर्श हैं। यह कहते-कहते उन्होंने वह शॉल उन्हें ओढ़ा दी।
राधेश्याम जी उनकी विरक्ति भावना और आदर्श शिक्षक के प्रति श्रद्धा देख दंग रह गए।