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आखिर ऐसा क्या हुआ बाप को लेना पड़ा बेटे के रुप में पुनर्जन्म

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यूं ही नहीं कहते कि यह दुनिया एक रहस्य है। आत्मा कहां से आती है और व्यक्ति के मरने के बाद कहां चली जाती है यह कोई जान नहीं पाया है। इस रहस्यमयी दुनिया का एक और बड़ा रहस्य है पुनर्जन्म।
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भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि जब कोई मरता है तो आत्मा अपने नए सफर पर निकल जाता है और किसी नए शरीर को प्राप्त करके पुर्वजन्म के कर्मों का फल भोगता है।

इस पुनर्जन्म की कहानी में भी ऐसी ही बात सामने आई है। बेटे ने पिता की मृत्यु के बाद ऐसा काम किया कि पिता को अपने ही बेटे का पुत्र बनकर जन्म लेना पड़ा।

दादा का हुआ पोते के रुप में पुनर्जन्म

यह घटना है कानपुर की तहसील देरापुर की। यहां श्रीमथुरा दुबे और श्रीमती दुलारी देवी नाम के एक दंपत्ति रहा करते थे। इनकी चार बेटियां। दुलारी देवी पुत्र प्राप्ति के लिए साधु संतों की खूब सेवा करती और भगवान शिव की पूजा करती। इनकी पूजा और तपस्या सफल हुई और एक दिन इनके घर एक बालक का जन्म हुआ।

माता-पिता ने अपने पुत्र का नाम मदन रखा। पुत्र प्राप्ति के बाद भी मथुरा दुबे और दुलारी देवी को खुशी नहीं मिल पायी क्योंकि मदन जन्म से एक आंख से देख नहीं सकता था।

इनके दुख का कारण यह नहीं नहीं था। असल दुःख तो इस बात का था कि मथुरा दुबे के पिता परमसुख दुबे को अपने पुत्र की एक गलती के कारण पोते के रुप में पुनर्जन्म लेना पड़ा और इस जन्म में वह एक आंख से अंधे हो गए थे।
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आखिर कौन सी गलती हो गई थी मथुरा दुबे से

जब मथुरा देवी की पत्नी दुलारी देवी गर्भवती थी। उस दौरान एक रात दुलारी देवी ने सपने में अपने ससुर परमसुख दुबे को देखा। परमसुख दुबे ने कहा कि तुम लोगों ने हमारा दाह संस्कार सूर्यास्त के समय कर दिया, इसलिए हमारा क्रिया कर्म नष्ट हो गया।

इस कारण से मेरी एक आंख की रोशनी चली गई है। अब मै ही तुम्हारे पुत्र के रुप में जन्म लूंगा। तुम्हारा यह पुत्र काना होगा। इस सपने को देखकर दुलारी देवी हैरान हुई थी उससे भी अधिक हैरान उस समय हुई जब वास्तव में उनके गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ जो काना था।

मदन जब कुछ बड़ा हुआ तब उसने कई ऐसी बातें बताई जो उसके पुनर्जन्म की बात को साबित करती थी। मदन ने बड़े होकर ऋषिकेश के संत श्रीसत्यानंद सरास्वती से संन्यास की दीक्षा ली और मदनानदं सरस्वती के नाम से जाना गया है।

यह घटना 1960 की है। इस घटना का उल्लेख गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित 'परलोक और पुनर्जन्म की सत्य घटनाएं' नामक पुस्तक में किया गया है।

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