तब सृष्टि की शुरुआत ही हुई थी। उस समय दो देवशक्तियां थीं, एक रजनी और दूसरा दिवाकर। दोनों में खूब पटती थी, पर दोनों के मिजाज अलग-अलग थे। रजनी आराम करना, सजना-संवरना पसंद करती थी, तो दिवाकर हरदम दौड़ते-भागते रहना। रजनी कभी चंदा-सी पूरी खिल जाती, तो कभी सिकुड़कर आधी हो जाती। वहीं दिवाकर लाल चेहरा लिए पसीना बहाता, दौड़ भाग में लगा रहता।
दिवाकर और रजनी में अक्सर बहस होती। दिवाकर कहता, काम ज्यादा जरूरी है और रजनी कहती आराम। दोनों अपनी-अपनी दलीलें रखते, पर किसी भी नतीजे पर वे न पहुंच पाते। हारकर भगवान ने थोड़े समय के लिए रजनी को दिवाकर के उजाले वाली चादर दे दी और दिवाकर को रजनी की अंधेरे वाली, ताकि एक-दूसरे का काम करते हुए वे खुद ही फैसला कर सकें।
और उस दिन से सुबह दिन का रूप धारण किए रजनी जल्दी-जल्दी काम निपटाती है और रजनी बने दिवाकर को आराम का महत्व समझ में आने लगा है। अब वह रजनी को आलसी नहीं कहता, बल्कि थकने पर खुद भी आराम करता है। सुनते हैं, अब दोनों ही जान गए हैं कि अपनों में छोटा या बड़ा, कुछ नहीं होता।
कोई महीने भर बाद दिवाकर और रजनी को एक दिन भगवान के घर से बुलावा आया। दोनों पहुंचे और भगवान ने एक-दूसरे का हाल पूछा। दोनों एक-दूसरे से संतुष्ट थे। वे कहने लगे, कहीं मतभेद हो, तो एक दूसरे का काम बदल कर फर्क समझ आ जाता है और किसी को शिकायत नहीं रहती।
दिवाकर और रजनी को समझ में आ गया कि कोई भी व्यक्ति कम या ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं। सबके अपने-अपने काम हैं। जीवन सुचारु और शांतिमय हो, इसके लिए काम और आराम, दोनों जरूरी हैं।