धर्मशास्त्रों में कहा गया है, दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये संचयो न कर्तव्यः यानी धन का दान दें, सदुपयोग करें, परंतु संचय न करें। पंचतंत्र में भी कहा गया है, दान, भोग और नाश- धन की ये तीन गतियां होती हैं। जो न किसी को धन देता है, न जीवन में उसका सदुपयोग करता है, उसका धन उसी प्रकार नष्ट हो जाता है, जिस प्रकार मधुमक्खियों द्वारा संचित मधु को लोग ले जाते हैं।
एक बार घनश्यामदास बिड़ला ने गांधी जी से पूछा, आपकी दृष्टि में मनुष्य को किस सीमा तक धन संचय करना चाहिए? गांधी जी ने कहा, मनुष्य को जीवन निर्वाह के लिए जितना धन आवश्यक है, उतना ही संचय करना चाहिए।
किफायत करके उतना धन जमा करना चाहिए, जो किसी तात्कालिक संकट, बीमारी आदि में काम आ सके। आवश्यकता से ज्यादा आय होने पर उस धन को समाज और राष्ट्र के काम में लगाने में ही उसकी सार्थकता है।
धन-संपत्ति का मालिक समझ लेने के दुराग्रह से ही समाज में विषमता पनपती है, जो तरह-तरह की कलह का कारण बनती है। महर्षि अरविंद ने अपनी धर्मपत्नी मृणालिनी देवी को एक पत्र में लिखा, मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि मेरे पास जो गुण, प्रतिभा, उच्च शिक्षा/विद्या तथा धन-संपत्ति है, वह ईश्वर की है।
एक बार जब बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा, तो स्वामी विवेकानंद ने आह्वान किया, तिजोरियां खोलकर धन पीड़ितों की सेवा में लगा दो, तभी धन सार्थक माना जाएगा।