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एक लड़की की प्रार्थना ने किया ऐसा चमत्कार, पढ़कर आप भी हैरान रह जाएंगे

Fri, 03 Jul 2015 01:26 PM IST
रा. श्री.
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लगभग सोलह सौ वर्ष पहले की बात है। संत स्कालस्टिका प्रत्येक वर्ष अपने भाई संत बेनडिक्ट से मिलने जाया करती थीं। दिन भर आध्यात्मिक विषय पर बात करके वह शाम को अपने स्थान को लौट जाया करती थी, क्योंकि स्कालस्टिका का यह नियम था कि वह रात में अपने मठ में ही निवास करती थीं, और बेनडिक्ट भी केसिनी की पहाड़ी पर स्थित अपने मठ में चले जाते थे।
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स्कालस्टिका को केसिनी मठ में जाने की आज्ञा नहीं थी। इससे वर्ष में एक दिन बेनडिक्ट भी मठ से कुछ दूर आ जाते थे बहन से मिलने के लिए, और स्कालस्टिका भी आ जाती थी। एक साल संत स्कालस्टिका अपने भाई से मिलने गईं। उन्हें ऐसा लगा कि वह उनकी अंतिम भेंट है। मिलने पर स्कालस्टिका ने अपने भाई से प्रार्थना की, मेरी बड़ी इच्छा है कि आज आप अपने मठ में न जाएं। यह कहते-कहते उनका हृदय भारी हो चला था,और आंखों से आंसुओं की धार बहने लगी थी।

बहन, तुम ठीक कहती हो, पर मैं अपने नियम से विवश हूं। मेरे लिए मठ से बाहर रात में रहना अत्यंत कठिन है। दिन में तो हमलोगों ने भगवान की स्तुति, स्मरण और चिंतन में अपने समय का सदुपयोग किया ही है-यह कहकर संत बेनडिक्ट ने अपने साथियों के साथ केसिनी की पहाड़ी पर स्थित मठ की ओर प्रस्थान करना चाहा। भाई के दृढ़ निश्चय से स्कालस्टिका का गला भर आया। वह मन में भगवान का ध्यान करने लगीं। अचानक आकाश में बादल छा गए, बिजली चमकने लगी, पवन का वेग बढ़ गया और वृष्टि होने लगी।
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संत बेनडिक्ट ने कहा, बहन, ईश्वर क्षमा करें। तुमने यह क्या कर डाला। स्कालस्टिका ने प्रसन्न होकर कहा, मैंने आपका दरवाजा खटखटाया, पर आपने मेरी पुकार की उपेक्षा कर दी। मैंने भगवान से प्रार्थना की, तो उन्होंने अपनी कृपा से मुझे निहाल कर दिया। अब तो आप रुकेंगे ही!
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प्रार्थना की शक्ति अमोघ है- यह कहते हुए बेनडिक्ट ठहर गए। उन्होंने रात में अपनी बहन से भगवच्चर्चा संबंधी बात की। निस्संदेह यह उनकी अंतिम भेंट थी।
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