जापान में एक युवा समुराई तेन यान रहता था। यान अपनी मंगेतर इलियाना से बहुत प्रेम करता था। एक दिन इलियाना जंगल से गुजर रही थी कि एक आदमखोर बाघ ने उस पर हमला कर दिया। समुराई ने अपनी प्रेयसी को बचाने की भरसक कोशिश की, पर उसे बचा न सका। दुख और गुस्से में डूबे समुराई ने संकल्प लिया कि वह अपनी प्रिया की असमय मृत्यु का प्रतिशोध लेगा और उस बाघ को खोजकर खत्म कर देगा।
तेन यान अपने धनुष-बाण लेकर गहरे जंगल में चला गया और हफ्तों तक उस बाघ की खोज करता रहा। एक दिन उसे वही बाघ कुछ दूरी पर सोता दिखाई दिया। उसने अपना धनुष उठाया और निशाना लगाकर बाण छोड़ दिया। बाण बिजली की गति से छूटकर बाघ के शरीर को भेद गया। धनुष पर दूसरा बाण चढ़ाकर वह बाघ की मृत्यु निश्चित करने के लिए सतर्कतापूर्वक उसकी ओर बढ़ा, लेकिन वह यह देखकर अचंभित रह गया कि उसके तीर ने बाघ को नहीं, बल्कि उसके जैसे दिखने वाले धारीदार पत्थर को भेद दिया था!
इस घटना के बाद उसकी धनुर्विद्या की चर्चा थी। लोग मिसाल की तरह सुनाते कि उसने किस तरह एक पत्थर को तीर से भेद दिया। गांव के बड़े-बुजुर्गों ने उसकी परीक्षा लेनी चाही। उससे कहा गया कि फिर से वह पत्थर को भेदकर बताए। लेकिन वह उन्हें भेदने का करिश्मा दोहरा नहीं सका। यह कथा सुनाकर बौद्ध भिक्षु तिक साह ने कारण बताया कि बाद में समुराई के तीर पत्थर को इसलिए नहीं भेद सका, क्योंकि वह जानता था कि वह पत्थर पर तीर चला रहा है।