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प्यार की खातिर यह क्या कर लिया, जान संकट में आ गई

Fri, 08 Aug 2014 01:51 PM IST
अश्वघोष
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बुद्ध उस दिन एक लोहार के यहां भोजन करने गए थे। लोहार अत्यंत गरीब था। उसके पास बुद्ध को खिलाने के लिए कुछ नहीं था। वह बरसात में लकड़ियों पर उगने वाले छतरीनुमा कुकरमुत्ते की सब्जी बड़े प्रेम से बना लाया। जहर से भी ज्यादा कड़वी सब्जी थी वह।
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बुद्ध उसे खाते रहे, बुद्ध का वह प्रेमी शिष्य पूछता रहा, कैसी लगी? बुद्ध मुस्कराए, तो उसने और सब्जी थाली में डाल दी। उसका प्रेम देखकर बुद्ध मुस्कराते रहे और पूरी सब्जी खा गए। देह में जहर फैल गया। चिकित्सक बोले, आप जानते थे सब, फिर भी लोहार को रोका क्यों नहीं? बुद्ध बोले, मौत तो एक दिन आनी ही थी, वह अभी आ गई।

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जब भी आती है, तो लगता है कि अभी ही आई है। उसका आना तो निश्चित था। उससे बचने की व्यर्थ कोशिश में प्रेम को कैसे रोक देता? मैंने प्रेम को आने दिया, प्रेम को होने दिया और मौत को स्वीकार किया। हानि कुछ ज्यादा नहीं-कल परसों में मरना ही था, लेकिन प्रेम की कीमत पर जीवन को कैसे बचा सकता हूं।
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बुद्ध का वह चिकित्सक वैद्य और शिष्य अपने आराध्य की दशा देखकर बिसूरते रहे। बुद्ध के शरीर में बड़ी पीड़ा हो रही थी। शिष्यों को वह इस तरह समझा रहे थे, जैसे कुछ खास हुआ ही न हो। उन्होंने अपने एक गृही शिष्य से कहा, ऐसा ही होता है प्रेम! आप प्रेमवश होकर जहर पी जाते हैं, खुद दुख उठाते हैं, पर अपने परिजनों के लिए एक से बढ़कर एक कष्ट सहते हैं।

वे कष्ट जहर की तरह ही होते हैं। लेकिन आप प्रेमवश सब होने देते हैं। प्रेम को खोजने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं होती, आपको खुद के भीतर झांकना होता है। हम सभी के भीतर हमेशा प्रेम कलश भरा होता है। उसे बस प्रेम से छूने की देर होती है।
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