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जब कबीर के भंडारे में भैंस बनकर भोजन करने आए राम

Sat, 25 Jan 2014 09:39 AM IST
शिवकुमार गोयल
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संत कबीरदास प्रायः गाया करते थे, कबिरहिं फिकर न राम की घूमत मस्त फकीर। पीछे-पीछे राम हैं, कहत कबीर-कबीर। एक शिष्य ने उनसे कहा, गुरुजी, जब प्रभु राम आपके पीछे-पीछे घूमते हैं, तो क्यों न हमें भी एक बार उनके दर्शन का सौभाग्य मिले।
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कबीरदास ने कहा, भैया, भगवान उसे दर्शन देते हैं, जो दुर्व्यसनों से मुक्त होता है, मेहनत की कमाई करता है और गरीब-निराश्रितों व साधु-संतों को भोजन कराता है। ईमानदारी की कमाई से भोजन बनाकर साधु-संतों को जिमाओ, भगवान अवश्य ही दर्शन देंगे।

शिष्य ने अपने अवगुण त्याग दिए और मेहनत से कमाई करने लगा। एक दिन वह बोला, गुरुदेव, आज मैंने भंडारे की व्यवस्था की है। आप भोजन करने पधारें और मुझे भगवान के दर्शन कराएं।
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भंडारे में कई साधु-संत पहुंचे। शिष्य कबीरदास की प्रतीक्षा करने लगा। अचानक उसने देखा कि एक भैंस रसोईघर में घुसकर पूरियों के छकड़े में मुंह मार रही है। क्रोधवश लाठी लेकर वह भैंस पर पिल पड़ा।

कबीरदास उस भैंस से लिपटकर रोते हुए कह रहे थे, हे राम, तुम पर रावण ने भी ऐसा जुल्म नहीं किया, जैसा मेरे शिष्य ने आज किया।

शिष्य को देखकर वह बोले, अरे दुष्ट, भगवान भोजन करने आए थे। तूने कसाई जैसा व्यवहार क्यों किया? शिष्य समझ गया कि गुरुदेव तो प्राणिमात्र में अपने राम के दर्शन करते हैं। वह उनके चरणों में लोट गया।
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