कोई डेढ़ हजार वर्ष पहले की घटना है। चीन के सम्राट ह्वि-चान ने ऐलान किया कि राज्य की नई मुहर बनाई जाए। उस मुहर पर एक बांग देते हुए मुर्गे का चित्र हो। जो चित्रकार सबसे जीवंत चित्र बनाएगा, वह राज्य का कलागुरु होगा और उसे पुरस्कार भी दिया जाएगा।
जगह-जगह से चित्रकार आए। उन्होंने बोलते हुए मुर्गे के चित्र बना रखे थे। सभी चित्रों को राजसभा में पेश किया गया। लेकिन कौन तय करे कि अमुक चित्र सुंदर है। राजधानी में एक बूढ़ा कलाकार था। सम्राट ने चयन के लिए उसे बुलाया। चित्रकार ने खुद को उन चित्रों के साथ एक बड़े भवन में बंद कर लिया।
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पूरे दिन चित्रों को परखने के बाद उसने कहा, एक भी चित्र ठीक नहीं है! राजा हैरान हुआ। उसने चित्र परखने की कसौटी पूछी। चित्रकार ने कहा, मैं एक मुर्गे को चित्रों के पास ले गया, लेकिन मुर्गे ने उन चित्रों के मुर्गों को पहचाना भी नहीं। अगर वे मुर्गे जीवंत लगते, तो वह मुर्गा घबराता या बांग जरूर देता।
तब सम्राट ने उसे ही चित्र बनाने का आदेश दिया। उस बुजुर्ग ने तीन वर्ष का वक्त मांगा। छह महीने बाद राजा ने कुछ लोगों को चित्रकार की खोज में भेजा। लोगों ने देखा कि वह बूढ़ा जंगली मुर्गों के पास बैठा हुआ है। तीन साल बाद जब उस चित्रकार के बनाए चित्र को मुर्गों के पास लाया गया, तो वे उस चित्र को देखकर डर गए और कमरे से बाहर भागे।
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राजा ने जीवंत तस्वीर की वजह पूछी, तो बूढ़े ने कहा, पहले मेरा मुर्गा हो जाना जरूरी था, तभी मैं मुर्गे को निर्मित कर सकता था। मुझे मुर्गे को भीतर से जानना पड़ा कि वह क्या होता है। और जब तक मैं मुर्गे के साथ एक न हो जाऊं, तब तक कैसे जान सकता हूं कि मुर्गा भीतर से क्या है, उसकी आत्मा क्या है?