प्रसिद्ध दार्शनिक-लेखक कार्लाइल पचासी वर्ष तक जीवित रहे और अंत समय तक निरंतर लिखते रहे। अस्सी वर्ष की उम्र में उन्हें अचानक ख्याल आया कि वह बूढ़े हो गए हैं। और जो देह कभी अति सुंदर और स्वस्थ थी, वह अब जर्जर और ढीली हो गई थी। जीवन संध्या के लक्षण प्रकट होने लगे थे।
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ऐसे बुढ़ापे के दौर की ही एक सुबह कार्लाइल स्नान के बाद जैसे ही शरीर को पोंछने लगे, तो देखा कि वह देह तो कभी की जा चुकी है, जिसे वह अपनी मान बैठे थे! शरीर तो बिलकुल ही बदल गया है। वह काया अब कहां है, जिससे उन्होंने प्रेम किया था? जिस पर उन्होंने गौरव किया था, उसकी जगह यह खंडहर ही शेष रह गया है। साथ ही एक अभिनव-बोध भी उनके भीतर अकुंरित होने लगा : 'शरीर वह नहीं है, लेकिन वह तो वही हैं। वह तो नहीं बदले हैं।'
उन्होंने स्वयं से ही पूछा था, ' फिर मैं कौन हूं?' यही प्रश्न सबको अपने से पूछना होता है। यही असली प्रश्न है। जो इसे नहीं पूछते, वे कुछ नहीं पूछते। और, जो पूछते नहीं, वे उत्तर कैसे पा सकेंगे? कार्लाइल ने सोचा, वह तो कतई नहीं हूं, जिसने पिछले पचास-साठ साल से काम किया है।
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वह शरीर तो नहीं है, जिस पर लावण्य, स्फूर्ति, शक्ति और सौंदर्य छाया रहता था। कार्लाइल ने इस प्रश्न को बार-बार पूछा। और जब उत्तर मिला, तो एक नया ही कार्लाइल जन्म ले चुका था। इसके बाद कहते हैं कि कार्लाइल ने इतिहास को घटनाओं का ब्यौरा बताने के बजाय उसे प्रवृत्तियों की धारा के रूप में निरुपित किया।
वह जब मरने लगे, तो उनके एक मित्र ने पूछा कि क्या वह भावी पीढ़ियों के लिए कुछ कहना चाहते हैं। कार्लाइल ने कहा, पक्षी आकाश में यात्रा करते हैं, उन्हें वहां कोई पगडंडी नहीं मिलती। जो पगडंडियों पर चलते हैं, वह बंधे बंधाए मुकाम तक ही पहुंच पाते हैं।