संत अलवार की झोपड़ी में उनके सोने-भर की ही जगह थी। एक रात तेज बारिश हो रही थी। अलवार सोने से पहले की जाने वाली आराधना कर लेट गए। अभी ठीक से नींद भी नहीं आई थी कि किसी ने दरवाजा खटखटाते हुए पूछा, बाहर तेज बारिश हो रही है। क्या अंदर जगह है? मैं रात बिता सकता हूं?
अलवार ने दरवाजा खोला और आगंतुक को अंदर बुलाते हुए कहा, हां, यहां एक सो सकता है, पर दो बैठ सकते हैं। जरूर अंदर आइए।
वह और आगंतुक, दोनों बैठे रहे। इतने में तीसरा व्यक्ति आया और उसने भी आवाज लगाई, क्या अंदर जगह है? संत ने जवाब दिया, हां, दो तो बैठ सकते हैं, पर तीन खड़े हो सकते हैं। आप भी आइए। और उन्होंने तीसरे आगंतुक को भी अंदर बुला लिया। तीनों रात भर कोठरी में खड़े रहे। बाहर बारिश होती रही। सुबह जब तूफान थम गया, तब तीनों यात्री विदा हो सके।
अगर संत अलवार ने सोचा होता या कहा होता कि मेरा मकान छोटा है, और यदि यह बड़ा होता, तभी आगंतुकों को जगह देता, तो क्या उन्हें यह शोभा देता? या अगर वह यह कहते कि मेरी कोठरी छोटी है, मेरे अकेले के ही सोने लायक है, इस हालत में मैं इसे कैसे बांट सकता हूं, इसलिए अन्य किसी के पास जाइए, तो क्या वह 'संत अलवार' बनते? नहीं, इस तरह वह एक ऐसे सामान्य प्राणी होते, जिसे मनुष्य कहना भी मुश्किल है।