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महात्मा बुद्ध की इस बात को अपना लें तो जीवन में कभी दुखी नहीं रहेंगे

Thu, 07 Jan 2016 11:45 PM IST
- जानकीनाथ शर्मा
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उसके केश और वस्त्र भीगे हुए थे। मुख पर बड़ी उदासी और मन में अत्यंत खिन्नता थी। यह देखकर भगवान बुद्ध ने मृगारमाता विशाख से पूछा, ‘तुम्हारी ऐसी स्थिति देखकर आश्चर्य होता है।’ वह अभिवादन करके उनके निकट बैठ गई।
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उसने कहा, ‘इसमें आश्चर्य की क्या बात है भंते! मेरे पौत्र का देहांत हो गया है, इसलिए मृतक के प्रति यह शोक आचरण है।’ बुद्ध ने पूछा, ‘विशाखे! श्रावस्ती में इस समय जितने मनुष्य हैं, तुम उतने पुत्र-पौत्र की इच्छा करती हो?’ विशाखा का उत्तर था, ‘हां भंते!’ तथागत का दूसरा प्रश्न था, ‘श्रावस्ती में नित्य कितने मनुष्य मरते होंगे?

‘प्रतिदिन कम से कम दस मरते हैं। किसी दिन संख्या कम भी रहती होगी, पर कभी नागा नहीं होता।’ विशाखा इस तरह के प्रश्नों से विस्मित थी। ‘तो तुम किसी भी दिन बिना भीगे केश और वस्त्र के नहीं रहती होगी।’
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‘नहीं भंते! केवल उस दिन ही भीगे केश और वस्त्र में रहना होता है, जिस दिन किसी प्रिय (पुत्र या पौत्र) का देहांत होता है।'

‘इससे यह स्पष्ट होता है कि जिसके सौ प्रिय (अपने संबंधी) हैं, उसे सौ दुख होते हैं; जिसका एक भी प्रिय-अपना संबंधी नहीं है, उसके लिए जगत में कहीं भी दुख नहीं है। वह सुख का बोध करता है, सुखस्वरूप हो जाता है।’ भगवान ने दुख-सुख का विवेचन किया।

यह सुनकर विशाखा ने प्रसन्नता पूर्वक कहा, ‘मैं भूल में थी, भंते! मेरी आंखें खुल गईं। मुझे प्रकाश मिल गया।’

तथागत ने विशाखा को धर्मकथा का उपदेश देते हुए कहा, ‘जगत में सुखी होने का एकमात्र उपाय यह है कि किसी को प्रिय (अपना) न मानें, ममता न करें, रागरहित होना चाहें, तो कहीं भी संबंध न स्वीकार करें।’
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