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सुख की चाहत में कहीं आप भी तो यह गलती नहीं कर रहे?

Wed, 08 Oct 2014 10:26 AM IST
स्वामी रामकृष्ण परमहंस
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एक व्यक्ति घने जंगल में भागा जा रहा था। शाम का वक्त था। जंगल में घना अंधेरा था। उस अंधेरे के कारण कुंआ उसे दिखाई नहीं दिया और वह उसमें गिर गया। गिरते-गिरते उसके हाथ में कुएं पर झुके वृक्ष की एक डाल आ गई। नीचे झांका, तो देखा कि कुएं में चार विशाल अजगर मुंह फाड़े ऊपर की तरफ ताक रहे थे। वह जिस डाल को पकड़े हुए था, उसे भी दो चूहे कुतर रहे थे। इतने में एक हाथी कहीं से आया और वृक्ष के तने को हिलाने लगा। वह सिहर उठा।
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ठीक ऊपर की शाखा पर मधुमक्खी का छत्ता था। हाथी के हिलाने से मक्खियां उड़ने लगीं। छत्ते से शहद की बूंदें टपकने लगीं। एक बूंद शहद उसके होठों पर गिरा। उसने प्यास से सूख रही जीभ को होठों पर फेरा। शहद की उस बूंद में अद्भुत मिठास थी। उसने मुंह उपर किया, कुछ क्षणों बाद फिर शहद की बूंद मुंह में टपकी। वह इतना मगन हो गया कि विपत्तियों को भूल ही गया।

उस जंगल से शिव-पार्वती अपने वाहन से गुजर रहे थे। पार्वती ने शिव से उसे बचा लेने का अनुरोध किया। भगवान शिव उसके निकट जाते हुए कहा, मैं तुम्हें बचाना चाहता हूं। मेरा हाथ पकड़ लो। उस व्यक्ति ने कहा, भगवान, एक बूंद शहद और चाट लूं, तो चलूं। एक बूंद... फिर एक बूंद। हर बूंद के बाद अगले बूंद की प्रतीक्षा। अंत में थककर भगवान शिव चले गए।
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वह जिस जंगल से जा रहा था, वह जंगल है दुनिया और अंधेरा है अज्ञान। पेड़ की डाली आयु है। दिन रात रूपी चूहे उसे कुतरते हैं। अभिमान का मदमत्त हाथी उस पेड़ को उखाड़ने में लगा हुआ है। शहद की बूंदें संसार सुख है, जिनके कारण मनुष्य आस-पास के खतरे को अनदेखा करता है। सुख की माया में खोए मन को स्वयं भगवान भी नहीं बचा सकते।
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