एक बड़े सुंदर मकान के नीचे अनाज की दुकान थी। दुकान के सामने अनाज की ढेरी लगी थी। एक बकरा आया और उसने अनाज पर मुंह मारा। दुकान का मालिक पास ही बैठा था। उसके हाथ में नुकीली छड़ी थी। उसने बकरे के सिर पर जोर से छड़ी मार दी। बकरा 'में-में' करता हुआ भागा। ठीक उसी वक्त देवर्षि नारद और अंगिरा ऋषि वहां से गुजर रहे थे।
इस घटना को देखकर नारद को हंसी आ गई। अंगिरा ने इस असमय हंसी का रहस्य पूछा। नारद ने कहा, यह दुकान पहले बहुत छोटी थी। इसके मालिक ने इसी जगह अनाज का व्यापार शुरू किया और कड़ी मेहनत से उसे सींचा, आगे बढ़ाया और जमाया। निरंतर प्रगति करता हुआ वह नगरसेठ हो गया। उसकी गिनती बड़े व्यापारियों में होने लगी। परंतु अनाज की बुनियादी दुकान को अपने रहने के मकान के नीचे ही रखा; क्योंकि इसी दुकान से उसकी उन्नति हुई थी।
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नारद जी कहते चले गए- एक समय आया, जब मालिक की उम्र पूरी हो गई और वह मालिक मर गया। उसका बेटा उत्तराधिकारी हुआ। वही तरुण आज दुकान पर बैठा है। यह इस दुकान पर रोज घंटे भर आकर बैठता है। काम-काज तो नौकर करते हैं, लेकिन उसके पिता ने चूंकि यहीं से यात्रा शुरू की थी, इसलिए उसका पुत्र अब भी कुछ समय यहीं बिताता है।
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मुझे हंसी इस बात पर आ गई कि दुकान का वह मालिक यानी इस तरुण का पिता ही बकरे की योनि में पैदा हुआ है। एक समय वह इस सारे कारोबार का मालिक था, और आज एक मुट्ठी अनाज पर भी उसका अधिकार नहीं है। अनाज की ओर मुंह करते ही मार पड़ती है, और जिस पुत्र को बड़े प्यार से पाला-पोसा, वही मारता है। यही है जगत का स्वरूप।