मगध साम्राज्य के सेनापति चाणक्य से मिलने पाटलिपुत्र पहुंचे। शाम ढल चुकी थी। घरों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और व्यापारिक संस्थानों समेत रंगशालाओं में भी रंग-बिरंगी रोशनी बिखरी पड़ी थी। चाणक्य की कुटिया नगर से बाहर गंगा तट पर थी। सेनापति वहीं पहुंचे। उन्होंने देखा, चाणक्य अपनी कुटिया में दीपक के प्रकाश में कुछ लिख रहे थे।
उनके काम में रुकावट न आने देने के विचार से सेनापति वापस जाने लगे। तभी चाणक्य ने उन्हें पुकारा और आदरपूर्वक अपने पास बिठाया। सामान्य शिष्टाचार के उपक्रम में ही चाणक्य ने सेवक को आवाज़ लगाई और कहा कि इस दीपक को ले जाओ और दूसरा दीपक रख दो। सेवक दीपक बदल कर चला गया।
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सेनापति को चाणक्य का यह व्यवहार विचित्र लगा, पर उन्होंने कुछ कहा नहीं। दोनों निजी विषयों के अलावा राजकीय मसलों पर भी चर्चा करने लगे। जब चर्चा समाप्त हो गई, तब सेनापति ने चाणक्य से पूछा कि महाराज एक बात मुझे समझ नहीं आई! मैं जब यहां आया, तो आपने एक दीपक बुझवाकर रखवा दिया और ठीक वैसा ही दूसरा दीपक जलाकर रखने को कह दिया...जब दोनों में कोई अंतर न था, तो ऐसा करने की वजह?
चाणक्य ने मुस्कराते हुए कहा, भाई, जब आप आए, तब मैं राज्य का काम कर रहा था, इसलिए राजकोष से खरीदे गए तेल का दीपक था। पर जब मैंने आपसे बातचीत शुरू की, तो अपना दीपक जलाया, क्योंकि यह बातचीत व्यक्तिगत थी। मुझे राज्य के धन को व्यक्तिगत कार्य में खर्च करने का कोई अधिकार नहीं, इसीलिए मैंने ऐसा किया। जब हम अपने उपार्जन को दूसरों के निमित्त खर्च नहीं करते, तो राष्ट्र की संपदा को अपने काम के लिए ही क्यों उपयोग करें?