भगवान बुद्ध के पास अक्सर लोग अपनी जरूरतों और तकलीफों का समाधान पूछने भी जाते थे। एक बार श्रावस्ती का एक किसान चंडक उनके पास यह जानने के लिए गया कि उसके पड़ोसी चंद्रवर्धन को राजा ने सबसे अच्छे किसान का पुरस्कार क्यों दिया, जबकि उसके अपने खेत में कोई खास धान्य नहीं उगता। उससे अच्छी फसल तो आसपास खेती करने वाले किसान उगा लेते हैं। बुद्ध ने उससे एकांत में बात की और कुछ समझा कर भेज दिया। पता नहीं, क्या समझाया कि चंडक जाते वक्त खुश नजर आ रहा था।
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अगले दिन चंडक चंद्रवर्धन के खेत में गया। उससे पूछने लगा कि वह बेहतरीन धान्य कैसे उगा लेता है, जबकि उन्हीं बीजों को वह भी बोता है। चंद्रवर्धन ने अपने अतिथि को बढ़िया फसल उगाने के कुछ गुर सिखाए। उसने कई बातों के साथ उसे यह भी बताया कि जिन बीजों से वह उत्कृष्ट फसल उगाता है, उन्हें वह अपने आसपास के किसानों में भी बांटता है।
चंडक को यह बात अजीब लगी। उसने आश्चर्य से चंद्रवर्धन से पूछा, तुम्हें सबसे अच्छे बीजों के कारण ही तो अच्छी फसल उगानेवाले किसान का सम्मान मिला है। उन्हीं बीजों को साथी किसानों में बांट देने में कैसी अक्लमंदी है?
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चंद्रवर्धन ने कहा, खेती का यह व्यावहारिक नियम मुझे भगवान बुद्ध ने ही समझाया था। उन्होंने कहा था कि अच्छे बीजों से जो फसल तैयार होती है, उनके पराग कणों को हवा दूर-दूर के खेतों तक लेकर जाती है। यदि मेरे पड़ोसी किसान घटिया फसल उगाएंगे, तो सहपरागण के कारण मेरे खेत में होने वाली फसल भी अच्छी नहीं होगी। अच्छी फसल उगानेवाले किसान को हमेशा इसी तरह दूसरे किसानों की मदद करनी चाहिए।