स्वामी दयानंद गिरि एक ब्रह्मनिष्ठ संत थे। वह प्रायः कहा करते थे कि जो व्यक्ति गरीबों और असहायों से प्रेम करता है, भगवान उसे अपनी कृपा का अधिकारी बना देते हैं। स्वामी जी विरक्ति की साक्षात मूर्ति थे।
एक दिन किसी मजदूर ने उन्हें नंगे पांव विचरण करते देखकर कपड़े के जूते भेंट किए। उन्होंने उस निश्छल भक्त के जूते खुशी-खुशी स्वीकार कर लिए। कुछ महीनों के बाद उनका दूसरा भक्त नए जूते लेकर आया और प्रार्थना की कि पुराने जूते उतारकर उसके लाए जूते पहन लें। स्वामी जी ने जवाब दिया, इन जूतों में मुझे गरीब मजदूर के प्रेम की झलक दिखाई देती है। मैं इन्हें तब तक पहनता रहूंगा, जब तक ये पूरी तरह फट न जाएं।
एक बार उनके भक्त शिवरात्रि पर भंडारा कर रहे थे। स्वामी जी प्रवचन में कह रहे थे कि वही सत्कर्म सफल होता है, जिसमें गरीबों के खून-पसीने की कमाई लगती है। अचानक उन्होंने देखा कि दरवाजे पर कुछ लोग एक वृद्धा को हाथ पकड़कर बाहर निकाल रहे हैं। स्वामी जी ने कहा, माई को आदर सहित यहां लाओ।
वृद्धा आई और बोली, महाराज, मेरे ये दो रुपये भंडारे में लगवा दें। ये लोग नहीं ले रहे हैं। स्वामी जी ने भक्त को पास बुलाया और कहा, इन दो रुपये का नमक मंगवाकर भंडारे में लगवा दो। खून-पसीने की कमाई के नमक से भंडारा भगवान का प्रसाद बन जाएगा। यह सुनते ही उस भक्त का सिर शर्म से झुक गया।