सभी धर्मों के पहुंचे हुए संत-महात्माओं ने प्रेम को ही भगवान का साक्षात स्वरूप माना है। देवर्षि नारद भक्ति सूत्र में कहते हैं-अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम् अर्थात भगवान साक्षात प्रेमस्वरूप हैं। स्वामी रामतीर्थ से एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया कि भगवान के दर्शन और अनुभूति के क्या उपाय हैं?
रामतीर्थ जी ने पूछा, क्या तुमने कभी किसी से प्रेम किया है? उसने कहा, मैंने शुरू से संसार एवं सांसारिक लोगों से, यहां तक कि अपने से भी कभी प्रेम नहीं किया। रामतीर्थ ने जवाब दिया, तुम जैसा व्यक्ति प्रेमस्वरूप भगवान के दर्शन कैसे कर सकता है?
वल्लभ संप्रदाय के आचार्य गोस्वामी गोकुलनाथ जी के पास एक व्यक्ति पहुंचा। उसने कहा, महाराज, मुझे गृहस्थ जीवन में कोई सार नजर नहीं आता। मैं आपकी शरण में आया हूं। मुझे भगवत्प्रेम की ओर उन्मुख करें।
गोस्वामी जी ने पूछा, क्या गृहस्थ जीवन में रहते हुए किसी से राग-प्रेम की अनुभूति हुई है? उसने कहा, महाराज, देह, गेह, पत्नी, पुत्र, पौत्र-ये सभी स्वार्थी हैं। सांसारिक प्रेम रोग को मैं छलावा मानता हूं।
गोस्वामी जी ने कहा, हमारे संप्रदाय में प्रेम उत्पन्न करने का कोई साधन नहीं बताया गया है। हम तो यह मानते हैं कि मानव ही नहीं, प्रेम तो प्राणी मात्र, यहां तक कि जीव-जंतुओं के भी स्वभाव में होता है। संत-महात्मा केवल पहले से विद्यमान प्रेम की धारा को भगवान की ओर मोड़ने का अभ्यास कराते हैं।