एक धनाढ्य सेठ था। उसे अपने अकूत भंडार और उसमें रखी पुरानी शराब पर बड़ा घमंड था। उसके पास पुराने ढंग का एक सागर(शराब रखने और कप में डालने वाला ढक्कनदार बर्तन) भी था। सागर वह खास मौकों पर, और वह भी अपने लिए ही, इस्तेमाल करता था।
एक बार राज्य का एक बड़ा अधिकारी उससे मिलने आया। सेठ ने उसके बारे में पता लगाया और तय किया कि उसके सामने सागर निकालने की जरूरत नहीं है। फिर कुछ दिन बाद एक रोमन कैथोलिक बिशप उससे मिलने आया। इस बार भी उसने अपने-आप से कहा, नहीं, मैं इसके लिए भी सागर नहीं निकालूंगा। यह न तो उसका महत्व समझ पाएगा; और न ही उसमें रखी शराब की कीमत को इसके नथुने जान पाएंगे।
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एक दिन राज्य का राजा उसके घर आया और उसने उसके साथ शराब पी। लेकिन सेठ ने सोचा, मेरे भंडार की शराब इस तुच्छ राजा से कहीं ज्यादा रुतबे वाली है। यहां तक कि एक दिन, जब उसके भतीजे की शादी थी, उसने अपने-आप से कहा, नहीं, इन मेहमानों के सामने उस सागर को नहीं लाया जा सकता।
इस तरह दिन-महीने और साल बीतते गए और एक दिन वह मर गया। उसे और एक अन्य बूढ़े को वैसे ही एक साथ दफनाया गया, जैसे बरगद का बीज और किसी छोटे पौधे का बीज साथ-साथ जमीन में दफन होते हैं। और उस दिन, जब उसे दफनाया गया था, रिवाज के मुताबिक सभी सागरों को बाहर निकाला गया।
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तब वह पुराना सागर भी दूसरे सागरों के साथ रख दिया गया। उसकी शराब को भी गरीब पड़ोसियों में बांट दिया गया। किसी को भी उसके बेशकीमती होने का पता न चला। उनके लिए कप में डाली जाने वाली शराब सिर्फ शराब थी।