किसी भी प्रकार की साधना की सफलता के लिए शास्त्रों में मन को शुद्ध-पवित्र और छल-छद्म से रहित बनाने पर जोर दिया गया है। महर्षि पतंजलि कहते हैं, अपने मन को किसी भी प्रकार के राग-द्वेषों से मुक्त कर उसे परमात्मा की ओर उन्मुख करना चाहिए। भगवान से मन को जोड़ने का नाम ही योग है।
परमहंस बाबा मुक्तानंद कहते हैं, बालक का मन सर्वथा दोषरहित व निश्छल होता है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, कुसंग के कारण उसका मन चंचल होने लगता है तथा उसमें अनेक दोष आ जाते हैं। सभी दुर्गुण हमारे मन के असंयमित और चंचल होने के कारण अंदर से उपजते हैं।
वे कहीं बाहर से नहीं आते, इसलिए प्रतिदिन सत्संग, स्वाध्याय, साधना की आवश्यकता होती है। निरंतर सत्संग-स्वाध्याय से मन पवित्र रहता है। बाबा आगे कहते हैं, यदि मन को परमात्मा में रमाए रखने का अभ्यास हो जाए, तो वह हर पल, हर क्षण निश्छल बना रहता है। इसलिए परमात्मा को एक क्षण के लिए भी विस्मृत नहीं करना चाहिए।
संत रविदास जूते बनाते समय भी अपने मन को भगवान की ओर लगाए रखते थे। भक्तों को उपदेश देते हुए और हाथों से कार्य करते हुए भी मन को पवित्र बनाए रखने के लिए भगवान का नाम जपने की प्रेरणा दिया करते थे। इसलिए उन्होंने चमड़ा भिगोने वाली कठौती में गंगा के दर्शन कराकर सभी को चमत्कृत कर दिया था-मन चंगा, तो कठौती में गंगा।