एक महात्मा जंगल में कुटिया बनाकर एकांत में रहते थे। उनके अक्रोध, क्षमा, शांति, निर्मोहिता आदि गुणों की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। मनुष्य परगुण-असहिष्णु होता है। उनकी शांति भंग करके क्रोध दिलाया जाए-इसकी होड़ लगी। दो मनुष्यों ने इसका बीड़ा लिया। वे महात्मा की कुटिया पर गए। एक ने कहा, महाराज, जरा गांजे की चिलम तो लाइए। महात्मा बोले, भाई, मैं तो गांजा नहीं पीता। उन लोगों ने फिर कहा, अच्छा तो तंबाकू लाओ। महात्मा ने कहा, मैंने कभी तंबाकू का सेवन नहीं किया। उनसे फिर सवाल पूछा गया, तब बाबा बनकर जंगल में क्यों बैठा है? धूर्त कहीं का।
इतने में पूर्व की योजना के अनुसार कई लोग वहां जमा हो गए। उस आदमी ने सबको सुनाकर फिर कहा, यह पूरा ठग है, चार बार तो जेल की हवा खा चुका है। उसके दूसरे साथियों ने कहा, अरे भाई, मैं खूब अच्छी तरह से जानता हूं इसे। मैं साथ ही तो था। जेल में इसने मुझे डंडों से मारा था। यह देखो उसके निशान। यह रात को रामजनियों के साथ रहा है, दिन में बड़ा संत बन जाता है।
यह कहकर वे दोनों एक से बढ़कर एक झूठे आरोप संत पर लगाने लगे, ताकि महात्मा को क्रोध आ जाए। मगर महात्मा अब भी शांत बैठे थे। यह देखकर वे दोनों महात्मा के माता-पिता को, उनके साधन को तथा वेश पर भी गाली बकने लगे। गाली बकते-बकते जब वे थक गए, तो चुप हो गए। उनके पास कहने के लिए अब कुछ भी नहीं बचा। तब महात्मा ने हंसकर कहा, एक भक्त ने शक्कर की पुड़िया दी है। इसे जरा पानी में डालकर पी लो। थक गए होगे।
वह मनुष्य महात्मा के चरणों में गिर पड़ा और क्षमा मांगने लगा। महात्मा बोले, अगर सामने वाला गलती करे और हम अपने अंदर आग जला लें, तो यह उचित नहीं। क्रोध करना और अपने बदन पर छुरी मारना बराबर है। दूसरों की दी हुई गालियां और दुष्ट व्यवहार हमारा कोई नुकसान नहीं कर सकते।