ईसा मसीह नगर-नगर भ्रमण कर उपदेश दिया करते थे कि स्वर्ग का राज्य पाने के लिए प्रेम में पूरी तरह डूब जाना जरूरी है।
एक बार एक श्रद्धालु उनके पास पहुंचा। उसने पूछा, आप स्वर्ग के राज्य की बात कहते हैं। इस कठिन मंजिल तक कैसे पहुंचा जा सकता है?
ईसा
ने कहा, हर कोई स्वर्ग का राज्य प्राप्त कर सकता है, क्योंकि वह हर प्राणी
के भीतर विद्यमान है। जब आदमी यह समझ लेगा कि स्वर्ग उसके हृदय में मौजूद
है, तो वह राग-द्वेष और घृणा को अपने पास फटकने नहीं देगा। प्राणी मात्र से
प्रेम करनेवाला, अहंकार त्यागकर खुद को दूसरों से तुच्छ समझने वाला,
दूसरों की सहायता को तत्पर रहनेवाला स्वर्ग के राज्य में ही तो रहता है।
किसी ने ईसा से पूछा, हमने देखा है कि अनेक श्रद्धालु आपके उपदेशों का पालन करते हैं। फिर भी वे दुखी क्यों दिखाई देते हैं?
ईसा
ने कहा, खेत में बीज बोए जाते हैं। सबके सब एक से ही नहीं उगते। कुछ बीज
पथरीली जमीन पर गिरते हैं, उनके अंकुर जल्दी सूख जाते हैं। जो अच्छी जमीन
पर गिरते हैं, वे फलते-फूलते हैं। उनके आसपास इतनी मिट्टी होती है कि वे
उसमें अपनी जड़ों को जमा लें। इसी प्रकार मेरा उपदेश सुनने वाले कई बार
लोभ-लालच और कुसंग में आकर गलत काम कर बैठते हैं। वे भटककर स्वर्ग का
रास्ता भूल जाते हैं। श्रद्धालु की जिज्ञासा का समाधान हो गया।