कोई सैकड़ों साल पुरानी बात है। आस्ट्रेलिया में होबर्ट के समीप स्थित जंगल में भयंकर अग्निकांड हुआ। उसमें जलने वाले प्राणियों की संख्या का कोई अनुमान ही नहीं लगा पाया। आंधी भी 114 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चल रही थी। लोग भाग कर अपनी जान नहीं बचा पा रहे थे। आसपास के नगरों को आग लीलती जा रही थी। वहां की जेल के फाटक भी जलकर राख हो गए। यदि कैदी चाहते, तो आसानी से फरार हो सकते थे।
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लेकिन एक कैदी ने कहा कि शासकीय भवन तो राष्ट्रीय संपत्ति है। इसलिए वे भागने के बजाय आग बुझाने में लग गए। निरंतर छत्तीस घंटों तक कैदी आग बुझाने में व्यस्त रहे। अपने प्राणों को संकट में डालकर भी सरकारी भवनों की सुरक्षा का कार्य उन्होंने किया।
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इस बीच कई दमकलें भी आ गईं। दो दिन की लगातार कोशिशों के बाद आग पर काबू पा लिया गया। आग पूरी तरह काबू में आई, तो सभी कैदी अपनी-अपनी कोठरियों में वापिस आ गए। जेलर ने उनकी उपस्थिति ली। सभी कैदी यथावत थे। जेलर को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह कुछ कैदियों से पूछ बैठे, क्या आप लोग जेल से मुक्त नहीं होना चाहते? कैदियों ने अलग-अलग ढंग से बताया, लेकिन उनके कहने का आशय यही था कि जेल में भला कौन रहना चाहता है!
जेलर ने कहा, आप सबके लिए जेल छोड़कर भागने का अच्छा अवसर था, फिर आप लोग क्यों नहीं भागे?
कैदियों ने जवाब दिया, महोदय! बंधन में रहना तो कोई नहीं चाहता। हम तो कैदी हैं। हमें तो जेल में रहकर अपने अपराधों के पश्चाताप का अवसर दिया गया है। न्यायालय ने जितने समय की सजा दी, उससे पहले भागना, तो नियमों को तोड़ना है। हां, यदि सरकार हमारी सजा कम कर दे, तो हम लोग जा सकते हैं।