पंडित अनिकेत गंगा तट पर प्रतिदिन भागवत पुराण का पाठ-पारायण करते। उसी घाट पर एक घड़ियाल रहता था। भागवत कथा उसे बहुत सुहाती। एक दिन वह पंडित से बोला, मुझे शुरू से लेकर अंत तक विधिवत भागवत सुनाएं। आपको हर दिन सौ मोतियों की दक्षिणा दूंगा। पंडित अनिकेत ने वैसा ही किया। घड़ियाल रोज कथा सुनता और पंडित जी को दक्षिणा देता।
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कथा पूरी होने पर उसने एक हार और भेंट किया। साथ ही उसने पंडित अनिकेत से यह भी निवेदन किया कि किसी प्रकार से वह उसे त्रिवेणी संगम तक पहुंचा दें, तो वह एक घड़ा भरकर मोती उन्हें देगा। पंडित ने बैलगाड़ी का प्रबंध किया और घड़ियाल को त्रिवेणी पहुंचा दिया। घड़ियाल ने भी अपना वचन पूरा किया, मगर विदा करते समय घड़ियाल ने पंडित को नमन नहीं किया, बल्कि हंसने लगा। अनिकेत ने हंसी का कारण पूछा, तो घड़ियाल ने कहा, अपने पड़ोस के धोबी के गधे से इसका कारण पूछना।
पंडित जी सीधे उस गधे के पास पहुंचे और उससे घड़ियाल के हंसने का कारण पूछा। गधे ने कहा, पूर्वजन्म में मैं कौशल नरेश का अंगरक्षक था। वह त्रिवेणी तट पर आए, तो बहुत प्रभावित हुए। राजपाट दूसरों को देकर वहीं बस गए। मुझसे उन्होंने कहा, अब वेतन तो नहीं मिलेगा, पर चाहो, तो मेरे साथ रहकर तुम भी धन अर्जित करो। और यदि लौटना चाहो, तो एक सहस्र मुद्रा लेकर वापस चले जाओ।
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गधे ने कहा, मैं मुद्रा लेकर वापस चला आया। राजा तो स्वर्ग चले गए, पर मैं रुपयों के प्रपंच में पड़कर अनेक अनर्थ करता रहा और अब गधे की योनि में पड़ा कष्ट सह रहा हूं। अनिकेत यह सुनकर सन्न रह गए। वह त्रिवेणी तट पर घड़ियाल के पास गए और उसे गुरु मानकर आत्मकल्याण की साधना करने लगे।