सिकंदर अमरता की तलाश में भारत की ओर आया। हिंदूकुश पर्वत पर उसे एक योगी मिले, जो ध्यान की गहरी अवस्था में बैठे हुए थे। सिकंदर जैसे लोगों में कोई विवेक नहीं होता, इसलिए उसने जाकर योगी का ध्यान भंग कर दिया। उसने योगी से पूछा, क्या तुम मुझे बता सकते हो कि अमरता किस तरह मिल सकती है?
उसके बदले तुम जो चाहो, मैं तुम्हें दे सकता हूं। योगी ने पूछा, तुम्हारे पास क्या है? सिकंदर ने सभी लूटे हुए रत्नों, हीरे-मोतियों और स्वर्ण से भरे हुए बड़े-बड़े संदूकों को दिखाकर कहा, यह रही पूरी दुनिया की दौलत।
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योगी सिकंदर के मुंह पर आते-जाते भावों को देखते रहे। फिर मुस्कराते हुए बोले, ठीक है, तुम उसे जानने के लिए बहुत बेसब्र हो। देखो, इस दिशा में एक जंगल है। वहां तुम्हें एक छोटी-सी गुफा मिलेगी। उस गुफा में प्रवेश करना, वहां एक छोटा जलकुंड होगा। उससे एक अंजुली पानी पी लो, तो अमर हो जाओगे।
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सिकंदर ने योगी के बताए मुताबिक गुफा खोजी। वह जलकुंड से पानी अपने हाथ में लेकर पीने ही वाला था कि कुंड के दूसरी ओर बैठा एक कौवा बोला, अरे रुको, महामूर्ख सिकंदर। सिकंदर हैरान रह गया। कौवा कांव-कांव न करके यूनानी भाषा बोल रहा था।
उसने ऊपर देखा। कौवा बोला, मैंने अमरता के इस कुंड से पानी पीया और मैं पता नहीं, कब से यहां बैठा हुआ हूं। मैंने जीवन में सब देख लिया है। मैं चाहे जो भी कर लूं, पर मैं मर नहीं सकता। इसलिए पानी पीने से पहले एक बार सोच लो।
सिकंदर कांपता हुआ वहीं खड़ा रहा। उसने कल्पना की कि दस हजार साल बाद भी वह इसी धरती पर रहेगा, वही बेवकूफाना चीजें करने की कोशिश करता रहेगा। उसे बात समझ में आ गई। वह वापस लौट पड़ा।