स्वामी विवेकानंद अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस के देहत्याग के बाद कहा करते थे, मुझे अब भी गुरुदेव के दर्शन की अनुभूति होती रहती है। वह मेरा निरंतर मार्गदर्शन करते रहते हैं।
वर्ष 1898 में बेलूर मठ का निर्माण हुआ। स्वामी विवेकानंद ने गुरुदेव के अवशेष वाले ताम्र कलश को कंधे पर उठाया और जुलूस के साथ उसे नए मठ में ले गए। शोभायात्रा शुरू होने से पहले उन्होंने कहा, गुरुदेव रामकृष्ण ने कहा था कि मैं अपने कंधे पर बैठाकर उन्हें जहां ले जाऊंगा, वह वहीं रहेंगे।
इसी कारण मैं उन्हें नए मठ में ले जा रहा हूं। गुरुदेव समय-समय पर कहा करते थे कि वह तभी तक मेरे साथ हैं, जब तक मैं सत्याचरण पर दृढ़ रहूंगा। जिस दिन मैं गलत कार्य करने लगूंगा, वह एक क्षण भी मेरे साथ नहीं रहेंगे।
स्वामी जी ने कहा, यह आप सब जानते हैं कि गुरुदेव आडंबर के घोर विरोधी थे। वह निश्छल हृदय और पूर्णरूपेण निष्कपट थे। सेवा-परोपकार को वह सर्वोपरि धर्म मानते थे।
उन्होंने कोई सांसारिक आकांक्षा नहीं रखी। हम सबको उनके आदर्श जीवन का अनुसरण करने का संकल्प लेना चाहिए, तभी उन्हें मठ में अपने साथ रख पाएंगे। विपरीत आचरण किया गया, तो वह सहज ही विदा हो जाएंगे।
स्वामी विवेकानंद अंतिम समय तक गरीबों को दरिद्र नारायण मानकर उनकी सेवा में लगे रहे।