ब्रह्मर्षि वसिष्ठ ने पत्नी अरुंधती से कहा, देवी! ऋषि विश्वामित्र के यहां से जरा नमक मांग लाओ। अरुंधती ने कहा, यह कैसी आज्ञा प्रभो। जिसने मेरे सौ पुत्रों का वध किया, उसी के आश्रम से लवण-भिक्षा? ऋषि ने कहा, देवी, विश्वामित्र बहुत प्रीतिकर ऋषि हैं। अरुंधती बोलीं, अगर प्रेम ही है, तो एक बार उन्हें 'ब्रह्मर्षि' ही कह देते। मुझे सौ पुत्र तो नहीं खोना पड़ते।
उधर विश्वामित्र वसिष्ठ की कुटिया के पीछे घात लगाकर खड़े थे। उन्होंने वसिष्ठ और अरुंधती की बातचीत सुन ली। उन्हें अचानक बोध हुआ। वह वसिष्ठ के चरणों पर गिर पड़े।
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वसिष्ठ उन्हें उठाते हुए बोले, उठो ब्रह्मर्षि, उठो। आज तुमने ब्रह्मर्षि-पद पा लिया है। तुम्हारे मन का कलुष धुल गया है। बोलो क्या चाहिए। विश्वामित्र ने ब्रह्मविद्या का उपदेश मांगा। वसिष्ठ ने इसके लिए शेषनाग के पास जाने के लिए कहा। विश्वामित्र अनंत देव के पास पहुंचे।
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शेषनाग ने शर्त रखी कि वे पृथ्वी का भार उठा लें। विश्वामित्र ने अपने तप का हवाला देकर पृथ्वी को उठाना चाहा। पर पृथ्वी उनसे नहीं संभली। शेषनाग ने कहा, यह तपस्या काफी नहीं है। कभी साधु-संग किया है? विश्वामित्र ने वसिष्ठ की संगति का पुण्य फल देने का संकल्प छोड़ दिया, और धरती स्थिर हो गई। शेषनाग ने कहा, जिसके क्षण भर का सत्संग पृथ्वी को धारण करने की शक्ति दे रहा है, वह तुम्हें ब्रह्मज्ञान दे चुके हैं। तुम्हें बस अपनी विनम्रता सिद्ध करनी थी।