अमर उजाला के पाठकों को संपादकीय पन्ने पर इसी जगह शिवकुमार गोयल के लिखे प्रसंग अब पढ़ने को नहीं मिलेंगे। वह अब हमारे बीच नहीं रहे। करीब छह महीने पहले ही उन्होंने आयु के पचहत्तर वर्ष पूरे किए थे। भक्ति और निष्ठा के संस्कार उन्हें पिता भक्त रामशरणदास जी के अलावा साधना और स्वाध्याय से भी मिले थे।
दिल्ली से कुछ ही दूर पिलखुआ में 31 अक्तूबर, 1938 को जन्मे शिवकुमार जी को बचपन से ही धर्म-मर्यादा के संस्कार मिले। स्वतंत्र विवेक को नदी के दो किनारों की मर्यादा से बांधकर चलने की आस्था ने उन्हें किसी भी व्यक्ति, विचार और संगठन का आलोचक नहीं बनने दिया।
सत्रह वर्ष की उम्र में उन्होंने लेखनी उठाई और हिंदी के लगभग सभी पत्र-पत्रिका और एजेंसियों के लिए लिखा। 1962 और 1967 में भारत की सीमाओं पर चीन और पाकिस्तान से लड़े गए युद्धों की रिपोर्टिंग गोयल जी की प्रतिभा का नया आयाम था। इन युद्धों की कथा पुस्तक रूप में आई, तो उसकी भूमिका राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने लिखी।
पचास से ज्यादा पुस्तकें लिखते हुए गोयल जी देश के लगभग सभी संत जनों और विभूतिवान व्यक्तियों से जुड़े रहे। प्रसिद्ध संत हरिबाबा, करपात्रीजी, उड़िया बाबा, चारों शंकराचार्य, मां आनंदमयी की चरणरज से पवित्र रहा गोयल जी का आवास अटल बिहारी वाजपेयी, श्रीमती ललिता शास्त्री और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का आतिथ्य भी कर चुका हैं।