एक कस्बा था, सुंदरपुर। वहां पहाड़ी पर ठाकुर जी का मंदिर था। मंदिर के पुजारी धापू बाबा पास ही रहते थे। वह बुजुर्ग थे, और उनकी आंखों की रोशनी भी कम हो चली थी। कस्बे में खुशबू और पंखुरी नामक दो सहेलियां भी रहती थीं। मंदिर जाते-जाते वे रास्ते में कुछ फूल चुनकर अपनी झोली में रख लेतीं।
एक दिन खुशबू ने पूछा, हम ठाकुर जी को कमल का फूल चढ़ाएं, तो हमें क्या मिलेगा? पुजारी ने कहा, कमल तो ठाकुर जी को सबसे प्रिय है। यह सुनकर खुशबू खुश हो उठी। पंखुरी ने कहा, आसपास तो कहीं भी कमल का फूल नहीं उगता।
खुशबू कुछ देर सोचकर बोली, पहाड़ी के पार जो तालाब है, उसमें मैंने कमल की एक कली देखी है। पंखुरी ने कहा, वह तालाब तो मेरे बाबा का है। यह सुनकर खुशबू उदास हो गई। पर अगले दिन वह तालाब जाने निकली। तालाब के पास उसने देखा कि पंखुरी फूल लेकर चली आ रही है। खुशबू को यह छल बुरा लगा।
इधर पंखुरी सीधे मंदिर पहुंची। उसने कमल का फूल धापू बाबा को सौंपा। बाबा बोले, मैं तुम्हारे नाम से ही यह फूल भगवान को चढ़ाऊंगा। तुम खुशबू ही हो ना? पंखुरी ने जवाब नहीं दिया। तुम खुशबू ही हो ना? पुजारी ने फिर पूछा।
अचानक पंखुरी ने कहा, हां, बाबा। यह खुशबू के नाम से ही चढ़ाना। झाड़ियों के पीछे छिपी खुशबू ने जब यह सुना, तो खुशी के मारे उसकी आंखों से आंसू बह निकले।