उस समय भारत में राजा शर्याति का शासन था। वह अत्यंत न्यायप्रिय और प्रजासेवक थे। एक दिन राजा अपने परिवार के साथ वन विहार के लिए निकले। दंपति तो सरोवर के निकट बैठ गए, पर राजकुमारी सुकन्या ने मिट्टी के टीले में दो चमकदार मणियां देखीं। कौतूहलवश टीले के निकट जाकर उसने लकड़ी की सहायता से मणियों को निकालने की कोशिश की। मणि तो निकली नहीं, वहां से खून बहने लगा।
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यह देखकर सुकन्या घबरा गई। पिता से उसने पूरी बात कही। शर्याति उस स्थान पर पहुंचे और देखकर बोले, अनर्थ हो गया। यह च्यवन ऋषि हैं, जिनकी आंखें तुमने फोड़ दीं। शर्याति ने बताया कि महर्षि च्यवन यहां तपस्या कर रहे थे। आंधी-तूफान और वर्षा के कारण उनका शरीर मिट्टी का टीला बन गया। ऋषि उसी में दबे बैठे रहे और तुम्हें नहीं दिखे। इतने में च्यवन ऋषि की कराह सुनाई दी। सुकन्या ने तय किया कि वह प्रायश्चित करेगी।
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शर्याति ने कहा, कितना ही कुछ करो, आंखें तो वापस नहीं आएंगी। इस पर सुकन्या बोली, मैं इनकी आंखें बनूंगी। मैं मात्र भूल व क्षमा का बहाना बनाकर अपराध मुक्त नहीं होना चाहती। मैं ऋषि से विवाह करूंगी।
शर्याति ने च्यवन ऋषि की उम्र का हवाला दिया, पर राजकुमारी नहीं मानी। अंततः राजा शर्याति ने अपनी पुत्री का विवाह च्यवन ऋषि से कर दिया। सुकन्या की इस अद्भुत त्याग भावना को देखकर देवगण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने एक औषधि बताई, जिसका सेवन कर च्यवन युवा हो गए। उस औषधि का नाम ही बाद में च्यवनप्राश हुआ, जिसे आज लोग स्वास्थ्य लाभ के लिए ग्रहण करते हैं। प्रायश्चित के कारण सुकन्या का नाम च्यवन ऋषि ने ‘मंगला’ रख दिया और कहा कि तुम्हारे त्याग भाव से आने वाली कई पीढ़ियां लाभ उठाती रहेंगी।