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Vijaya Ekadashi 2021: विजया एकादशी व्रत करने से होती है गौ दान से अधिक पुण्य फलों की प्राप्ति

Tue, 09 Mar 2021 08:09 AM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन, वास्तुविद
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फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी 'विजया एकादशी' कहलाती है। - फोटो : अमर उजाला
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शास्त्रों में एकादशी का व्रत बहुत ही प्राचीन,पवित्र और पापनाशक माना गया है। एकादशी तिथि जगतगुरु विष्णुस्वरूप है जो समस्त पापों का अपहरण करने वाली है। सभी एकादशी अपने-अपने नाम के अनुरूप ही फल देने वाली होती हैं। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी 'विजया एकादशी' कहलाती है। पदम् पुराण के अनुसार भगवान श्री कृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर को इस एकादशी की महिमा बताते हुए कहते हैं कि इसको करने से व्यक्ति को वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है एवं  मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इस व्रत का पालन करने से साधक को निःसंदेह सर्वत्र  विजय प्राप्त होती है। शुभ फलों में वृद्धि होकर अशुभता का नाश होता है। अतः सर्वथा प्रयत्न करके एकादशी व्रत करना चाहिए।  
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श्री विष्णु का करें पूजन  - फोटो : अमर उजाला
श्री विष्णु का करें पूजन 
विजया एकादशी व्रत के बारे में शास्त्रों में लिखा है कि यह व्रत करने से स्वर्णणदान,भूमि दान,अन्न दान और गौ दान से अधिक पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। इस दिन समस्त कामनाओं तथा सिद्धियों के दाता भगवान श्री नारायण की उपासना करनी चाहिए।  विजया एकादशी व्रत की पूजा में सात धान्य रखने का विधान है अतः एक वेदी बनाकर उस पर सप्त धान रखें। इस पर जल कलश स्थापित कर इसे आम या अशोक के पत्तों से सजाएं। तत्पश्चात भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित कर पीले पुष्प,ऋतुफल,तुलसी आदि अर्पित कर धूप-दीप से श्री हरि की आरती उतारें। व्रत की सिद्धि के लिए घी का अखंड  दीपक जलाएं ,एवं दीपदान करना शुभ माना गया है। इस दिन हरि भक्तों को परनिंदा,छल-कपट,लालच,द्वेष की भावनाओं से दूर रहकर श्री नारायण को ध्यान में रखते हुए भक्ति भाव से व्रत करना चाहिए।

lord vishnu
ऐसे मिली श्री राम को लंका पर विजय
त्रेता युग में श्री रामचंद्र जी के वनवास काल के दौरान जब लंकापति रावण माता सीता का हरण करके लंका ले गया,तब प्रभु श्री राम ने सुग्रीव की अनुमति लेकर लंका प्रस्थान करने का निश्चय किया। जब श्री राम अपने सैन्यदल सहित समुद्र के किनारे पहुंचे,तब उन्होंने भयंकर  जल जंतुओं से भरे अगाध समुद्र को देखकर लक्ष्मणजी  से कहा-'हे सुमित्रानंदन ! किस पुण्य के प्रताप से हम इस समुद्र को पार करेंगे।'तब लक्ष्मण जी बोले-'हे पुराण पुरुषोत्तम !,आप आदि पुरुष हैं, सब कुछ जानते हैं। यहाँ से आधा योजन की दूरी पर बकदालभ्य मुनि का आश्रम है ,उनके के पास जाकर आप इसका उपाय पूछिए।' लक्ष्मण जी की इस बात से सहमत होकर श्री राम बकदालभ्य ऋषि के आश्रम गए और उन्हें प्रणाम किया। मुनि ,प्रभु राम को देखते ही पहचान गए कि ये तो विष्णु अवतार श्री राम हैं , जो किसी कारणवश मानव शरीर में अवतीर्ण हुए हैं।

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महर्षि ने श्री राम से उनके आने का कारण पूछा। रामचंद्र जी कहने लगे-'हे ऋषे! मैं अपनी सेना सहित राक्षसों को जीतने लंका जा रहा हूँ अतः आप कृपा करके समुद्र पार करने  का कोई उपाय बताइए।' बकदालभ्य ऋषि बोले-'हे राम ! फाल्गुन कृष्ण पक्ष में जो विजया नाम की एकादशी आती है उसका व्रत करने से आपकी निश्चित विजय होगी,साथ ही आप अपनी वानर सेना के साथ समुद्र भी अवश्य पार कर लेंगे।' मुनि के कथनानुसार श्री रामचंद्र जी ने इस व्रत का विधिपूर्वक पालन किया।  इस व्रत को करने से श्री राम ने संग्राम में रावण सहित अनेकों दैत्यों को मारा व लंका पर विजय पायी और माता सीता को प्राप्त किया।
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चावल और जौ खाना है वर्जित
शास्त्रों में एकादशी के दिन चावल और जौ  का सेवन वर्जित माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माता शक्ति के क्रोध से बचने के लिए महर्षि मेधा ने शरीर का  त्याग कर दिया और उनका अंश पृथ्वी में समा गया।  इस दिन एकादशी तिथि ही थी। चावल और जौ के रूप में मेधा ऋषि उत्त्पन्न हुए इसलिए चावल और जौ को जीव माना गया है। मान्यता है कि एकादशी के दिन चावल खाना महर्षि मेधा के मांस  और रक्त का सेवन करने जैसा है। इस दिन खान-पान एवं व्यवहार में सात्विकता का पालन करके श्री हरि का स्मरण करना श्रेष्ठ है।
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