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विजयादशमी 2026: दशहरे पर क्यों होती है शस्त्र पूजा? जानें कब है पूजा का मुहूर्त, विधि और धार्मिक महत्व

Mon, 19 Oct 2026 03:02 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

दशहरे पर शस्त्र पूजन का विशेष महत्व होता है। इस दिन देवी अपराजिता की पूजा के बाद शस्त्रों की पूजा करने के विशेष विधान होता है। 
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दशहरे पर शस्त्र पूजा का महत्व - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिंदू धर्म में दशहरे के त्योहार का विशेष महत्व होता है। हर वर्ष अश्विन माह की दशमी तिथि पर दशहरा का पर्व बड़े ही जोश, उत्साह और भक्तिभाव से मनाया जाता है, इसे विजयादशमी भी कहते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दशहरे के दिन भगवान राम ने रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्ति की थी, जिसे असत्य पर सत्य की जीत के रूप में मनाया जाता है। इसके अलावा एक दूसरी मान्यता है कि इस दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का संहार किया था। जिसके कारण से विजय उत्सव के रूप में पूरे देशभर में विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है। विजयादशमी पर शस्त्र पूजा का विशेष महत्व होता है। इस दिन शस्त्र पूजन से पहले अपराजिता देवी की पूजा करने विशेष विधान होता है। आइए जानते हैं दशहरे पर  शस्त्र पूजा का शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और इसका धार्मिक महत्व। 
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विजयादशमी तिथि और मुहूर्त- 20 अक्तूबर 2026 

दशमी तिथि की शुरुआत- 20 अक्तूबर दोपहर 12 बजकर 50 मिनट से
दशमी तिथि की समाप्ति- 21 अक्तूबर दोपहर 02 बजकर 11 मिनट पर 

विजयादशमी शस्त्र पूजा का शुभ मुहूर्त- 20 अक्तूबर 2026
विजया मुहूर्त- दोपहर 01 बजकर 59 मिनट से लेकर 02 बजकर 45 मिनट तक।

विजयादशमी देवी अपराजिता की पूजा का शुभ मुहूर्त- 20 अक्तूबर 2026
दोपहर 01 बजकर 14 मिनट से लेकर 03 बजकर 30 मिनट के बीच कर सकते हैं। 

विजयादशमी रावण दहन का शुभ मुहूर्त- 20 अक्तूबर 2026
शाम 5 बजकर  47 मिनट से लेकर रात्रि 08 बजकर 21 मिनट तक। 

दशहरे पर शस्त्र पूजा और अपराजिता पूजन का महत्व
आदिकाल से ही दशहरे पर शस्त्र पूजन और देवी अपराजिता की पूजा की महत्व होता है। शस्त्र पूजन की परंपरा सनातन धर्म में आदि काल से चली आ रही है। देवी-देवता किसी भी युद्ध में शामिल होने से पहले शस्त्रों की पूजा जरूर करते हैं। इसके अलावा प्राचीन में राजा-महाराजा विजयादशमी पर भव्य रूप में शस्त्र पूजन का आयोजन करते थे। मौजूदा दौर में क्षत्रिय समाज के लोग और सेना विजयादशमी पर विशेष रूप से शस्त्र पूजन  करते हैं। शस्त्र पूजन के अलावा विजयादशमी पर व्यापारियों, कारीगरों और प्रतिष्ठानों द्वारा भी अपने औजारों, कारखानों की पूजा करत हैं। शस्त्र पूजा के लिए दोपहर का विजया मुहूर्त सबसे अच्छा माना जाता है। वहीं इस दिन देवी अपराजिता की पूजा करने से विजय की प्राप्ति और शत्रुओं का शमन होता है। 

भगवान राम से जुड़ी कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पहले और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए पहले मां अपराजिता और अपने अस्त्रों-शस्त्रों की पूजा की थी। जिसके बाद ही विजयादशमी पर रावण का वध करके लंका पर विजय हासिल किया था। 
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मां दुर्गा से जुड़ी कथा
एक दूसरी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक चले भंयकर युद्ध के बाद राक्षस का वध किया था, जिसके कारण बाद में सभी देवी-देवताओं ने मिलकर उनके शस्त्रों की पूजा की थी 

महाभारत से जुड़ी कथा
विजयादशमी पर शस्त्रों की पूजा के पीछे महाभारत से भी जुड़ी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी के पेड़ पर छिपाकर रखे थे और अज्ञातवास के पूरा होने के बाद विजयादशमी पर ही निकालकर कौरवों संग युद्ध किया था और विजय हासिल किया था।  
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शस्त्र पूजन विधि
- सबसे पहले सुबह जल्दी उठे और स्नान कर साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें। 
- फिर पूजा स्थल पर एक चौकी रखें और उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर शस्त्रों को रखें।
- इसके बाद चौकी पर रखें शस्त्रों पर गंगाजल का छिड़काव करते हुए उसे पवित्र करें। 
- फिर सभी शस्त्रों पर चंदन, कुमकुम का तिलक लगाकर उस पर रक्षासूत्र बांधे। 
- इसके बाद शस्त्रों पर फूल, माला, अक्षत, धूप और दीप प्रज्वलित करते हुए विधि-विधान से पूजन करें। 
- अंत में मंत्रों जाप, आरती करते हुए सभी को प्रसाद वितरण करें। 
 
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