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Sita Navami 2019 : आज है सीता नवमी, जानें इस पावन व्रत की पौराणिक कथा और महत्व

Mon, 13 May 2019 08:23 AM IST
Madhukar Mishra अनीता जैन, वास्तुविद्
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Sita Navami 2019
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को जनकनंदनी एवं प्रभु श्रीराम की प्राणप्रिया, सर्वमंगलदायिनी, पतिव्रताओं में शिरोमणि श्री सीताजी का प्राकट्य हुआ। यह दिन जानकी नवमी या सीता नवमी के नाम से जाना जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार इस पावन पर्व पर जो भी भगवान राम  सहित माँ जानकी का व्रत-पूजन करता है, उसे पृथ्वी दान का फल एवं समस्त तीर्थ भ्रमण का फल स्वतः ही प्राप्त हो जाता है एवं समस्त प्रकार के दु:खों, रोगों व संतापों से मुक्ति मिलती है।

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Sita Navami 2019
शाश्वत शक्ति का आधार हैं मां जानकी

गोस्वामी तुलसीदासजी ने सीताजी की वंदना करते हुए उन्हें उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली, क्लेशों को हरने वाली एवं समस्त जगत का कल्याण करने वाली राम वल्लभा कहा है। अनेकों ग्रंथ उन्हें जगतमाता, एकमात्र सत्य, योगमाया का साक्षात् स्वरुप व समस्त शक्तियों की स्त्रोत तथा मुक्तिदायनी कहकर उनकी आराधना करते हैं। सीताजी क्रिया-शक्ति, इच्छा-शक्ति और ज्ञान-शक्ति, तीनों रूपों में प्रकट होती हैं। माँ सीता भूमि रूप हैं, भूमि से उत्पन्न होने के कारण उन्हें भूमात्मजा भी कहा जाता है।
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Sita Navami 2019
मां सीता ने ही हनुमान को दिया था अष्टसिद्धि का वरदान

सूर्य,अग्नि एवं चन्द्रमा का प्रकाश सीता जी का ही स्वरुप है। चन्द्रमा की किरणें विभिन्न औषधिओं को रोग निदान का गुण प्रदान करती हैं। ये चंद्र किरणें अमृतदायिनी सीता का प्राणदायी और आरोग्यवर्धक प्रसाद है। माँ सीताजी ने ही हनुमानजी को उनकी सेवा-भक्ति से प्रसन्न होकर अष्ट सिद्धियों तथा नव निधियों का स्वामी बनाया।
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Sita Navami 2019
ऐसे बनीं सीता रावण के अंत का कारण

वाल्मीकि रामायण के अनुसार लंका के राजा रावण ने एक बार  हिमालय का भ्रमण करते हुए एक तपस्वनी कन्या को देखा, उसका नाम  वेदवती था। उस कन्या को देखकर रावण का चित्त कामजनित मोह के वशीभूत हो गया, उसने कन्या के निकट जाकर अभी तक उसके अविवाहित होने का कारण पूछा। वेदवती ने रावण को बताया कि मेरे पिता मेरा विवाह तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु से करना चाहते थे। लेकिन उनके इस अभिप्राय को जानकार दैत्यराज शम्भू मेरे पिता पर कुपित हो उठा और उस पापी ने मेरे पिता का वध कर दिया। पति वियोग में माता भी चिता की अग्नि प्रविष्ट हो गयीं। 

पिता के मनोरथ को पूर्ण करने हेतु मैंने तपस्या का मार्ग अपनाया। रावण ने वेदवती को पहले तो अपनी बातों में लेना चाहा, परन्तु उनके नहीं मानने पर उसने वेदवती के केश पकड़ लिए। क्रोधित वेदवती ने तत्काल ही अपने बालों को काट डाला। रावण को यह कहते हुए-''नीच राक्षस! इस वन में तूने मेरा अपमान किया है, इसलिए मैं तेरे अंत के लिए फिर उत्पन्न होउंगी''। यह वेदवती पहले सतयुग में प्रकट हुई थीं, फिर त्रेता युग आने पर उस राक्षस रावण के वध के लिए मिथलावर्ती राजा जनक के कुल में सीता रूप से अवतरित हुईं। 



 
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