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Navratri Fifth Day: आज नवरात्रि का पांचवां दिन दिन, ज़रूर करें इस स्तोत्र का पाठ

Sat, 27 Sep 2025 10:26 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

siddha kunjika stotram in hindi: नवरात्रि के पावन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की श्रद्धा और भक्ति से पूजा की जाती है। पंचमी तिथि को मां के पांचवें रूप, मां स्कंदमाता की विशेष आराधना की जाती है। उन्हें यह नाम उनके पुत्र भगवान स्कंद (कार्तिकेय) की माता होने के कारण मिला।
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मां स्कंदमाता की पूजा करने से भक्त को सांसारिक सुख, समृद्धि और मानसिक शांति के साथ-साथ दिव्य ज्ञान और उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। - फोटो : adobe stock
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विस्तार
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Siddha Kunjika Stotram: नवरात्रि के पावन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की श्रद्धा और भक्ति से पूजा की जाती है। पंचमी तिथि को मां के पांचवें रूप, मां स्कंदमाता की विशेष आराधना की जाती है। उन्हें यह नाम उनके पुत्र भगवान स्कंद (कार्तिकेय) की माता होने के कारण मिला। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां स्कंदमाता की पूजा करने से भक्त को सांसारिक सुख, समृद्धि और मानसिक शांति के साथ-साथ दिव्य ज्ञान और उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। उनकी कृपा से साधक के जीवन में सकारात्मकता और शुभता का संचार होता है।

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 नवरात्रि के इस पावन अवसर पर उनके दिव्य स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से माता रानी अपने भक्तों पर विशेष कृपा करती हैं और जीवन में आने वाली परेशानियों, बाधाओं और कष्टों से मुक्ति दिलाती हैं। इस स्तोत्र के पाठ से परिवार में सुख-शांति और व्यक्तिगत जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
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सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् - फोटो : Adobe stock
॥सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम्॥
शिव उवाच


शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्।

येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत॥॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।

न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥॥

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।

अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥॥

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।

मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।

पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥॥

॥अथ मन्त्रः॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं स:

ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।''

॥इति मन्त्रः॥
॥ इति मन्त्रः ॥
नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि ।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥॥

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि ।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे ॥॥

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥॥

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ॥॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥॥

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी ।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥॥

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं ।
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥॥

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे ॥॥

इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रंमन्त्रजागर्तिहेतवे ।
अभक्ते नैव दातव्यंगोपितं रक्ष पार्वति ॥
यस्तु कुञ्जिकाया देविहीनां सप्तशतीं पठेत् ।
न तस्य जायतेसिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥

॥ इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
 
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