भारतीय लोक संस्कृति में ऐसे अनेकों पर्व हैं, जो पर्यावरण और सेहत की सुरक्षा के भाव से जुड़े हैं। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला शीतला अष्टमी (बासोड़ा) का त्योहार भी हमें स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने का संदेश देता है। स्कंद पुराण के अनुसार ब्रह्माजी ने सृष्टि को रोगमुक्त रखने का कार्यभार देवी शीतला को सौंपा था। इसलिए प्राचीन काल से ही चैत्र कृष्ण अष्टमी को महाशक्ति के अनंतरूपों में से प्रमुख शीतला माता की पूजा-अर्चना की जाती रही है,जो स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी भी हैं। इनकी पूजा से दैहिक तापों ज्वर, चेचक, कुष्ठरोग ,फोडे-फुंसियां, चर्म रोग,संक्रमण तथा अन्य विषाणुओं के दुष्प्रभावों से मुक्ति मिलती है। यही बजह है कि संक्रामक रोगों से मुक्त रहने की भावना से देवी शीतला माता की पूजा की जाती है।
सूर्योदय से पूर्व पूजा
शीतला माता शीतलता प्रदान करने वाली देवी मानी गई हैं इसलिए सूर्य का तेज बढ़ने से पहले इनकी पूजा उत्तम मानी जाती है। पार्वती स्वरूपा देवी शीतला की पूजा का विधि-विधान भी सबसे निराला है। माता के भोग के लिए बासोड़ा से एक दिन पहले ही मीठे चावल, राबड़ी, पुए, हलवा, रोटी आदि पकवान तैयार कर लिए जाते हैं और अगले दिन सुबह बासी भोजन ही देवी को चढ़ाया जाता है। आज भी कई घरों में इस दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता है,परिवार के सभी सदस्य पूरा दिन इसी भोजन का आनंद लेते हैं। शीतला माता पर चढ़ाए हुए जल से आँखें धोने का विधान है।यह बात इस बात की ओर इशारा करती है कि गर्मी के मौसम में हमें अपनी आखों का ध्यान रखना चाहिए। पूजन करने के बाद माथे पर हल्दी का तिलक व घर के मुख्यद्वार पर परिवार की मंगल कामना हेतु हल्दी के दो स्वास्तिक बनाए जाते हैं। माना जाता है कि हल्दी का प्रयोग हमें कई गंभीर बीमारियों से बचाकर घर में सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है।
उपासना से होते हैं दुःख दूर
'ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः' देवी का यह चमत्कारी मंत्र मनुष्यों के सभी कष्टों को दूर कर उन्हें सुख-शांति,कीर्ति प्रदान करता है। स्कंद पुराण में देवी की अर्चना का स्त्रोत शीतलाष्टक के रूप में वर्णित है।धार्मिक मान्यता के अनुसार इस स्त्रोत की रचना स्वयं भगवान शिव ने जनहित में की थी। इस दिन जो भी स्त्री या पुरुष श्रद्धापूर्वक शीतलाष्टक का पाठ करते हैं माँ उन पर अनुग्रह करती हुई उनके घर-परिवार को सभी व्याधियों से दूर रखती है। देवी-देवता भी स्तुति करते हुए इनकी महिमा का गान करते हैं कि ''शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता। शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः अर्थात-हे माता शीतला ! आप ही इस सृष्टि की आदि माता और पिता हैं और आप ही इस चराचर जगत को धारण करतीं हैं अतः हे देवी! आपको बारम्बार नमस्कार है।
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