चैत्र माह की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को शीतलाष्टमी का व्रत रखा जाता है। इस बार यह व्रत 16 मार्च को है। शीतलाष्टमी का त्योहार होली संपन्न होने के आठवें दिन बाद मनाया जाता है। शीतला अष्टमी पर मां शीतला देवी की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। शीतला अष्टमी को बसौड़ा, लसौड़ा आदि नामों से जाना जाता है। यह व्रत विशेषकर राजस्थान में बड़े ही धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।
रोगों से मुक्ति प्रदान करता है शीतलाष्टमी की व्रत
हिंदू धर्म में शीतला माता को एक प्रमुख हिंदू देवी के रूप में पूजा जाता है। शीतला माता के बारे में स्कंद पुराण में विस्तार से बताया गया है। मान्यता है कि शीतला माता चेचक जैसे रोगों से लोगों की मुक्ति प्रदान करती हैं। मां शीतला देवी के स्वरूप में वह हाथों में कलश, सूप, झाडू और नीम के पत्ते धारण करते हुए गर्दभ में सवार अभय मुद्रा में दिखती हैं।
शीतला अष्टमी पूजन विधि
शीतली अष्टमी का व्रत अन्य दूसरे किसी व्रत या उपवास से एकदम भिन्न होता है। शीतलाष्टमी के एक दिन पहले यानी सप्तमी तिथि पर देवी को भोग लगाने के लिए भोग तैयार किया जाता है। फिर इस बासी भोग को अष्टमी तिथि पर देवी को भोग लगाया जाता है जिसे बसौड़ा कहा जाता है। शीतलाष्टमी पर मां की विधिवत पूजा अर्चना और शीतलाष्टक का पाठ पढ़ा जाता है। पूजा संपन्न होने के बाद घर के सदस्यों और आस-पास लोगों के बीच मां के प्रसाद बसौड़ा का वितरण किया जाता है। मान्यता के अनुसार हर साल जो भी भक्त इस व्रत को रखता है और विधिवत पूजा करता है मां शीतला उसके सभी शीतला जनित दोष को दूर करे उन्हें ज्वर, चेचक, नेत्र विका आदि रोगों से दूर करती हैं।
मान्यताएं और महत्व
शास्त्रों में बताया गया है कि चैत्र, बैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर मां शीतला देवी की पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मान्यता के अनुसार आज भी अष्टमी के दिन कई घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता है और सभी भक्त ख़ुशी-ख़ुशी प्रसाद के रूप में बासी भोजन का ही आनंद लेते हैं। इसके पीछे तर्क यह है कि इस समय से ही बसंत की विदाई होती है और ग्रीष्म का आगमन होता है, इसलिए अब यहां से आगे हमें बासी भोजन से परहेज करना चाहिए।