हिंदू धर्मग्रंथों में श्रावण माह की विशेष महिमा बताई गई है। कहा गया है कि'श्रावणे पूजयेत शिवम्'। अर्थात श्रावण मास में शिव पूजा विशेष रूप से फलदाई है। पूरे माह शिवभक्त भोले भंडारी की उपासना व सोमवार का व्रत करते हैं। कुंवारी कन्याएं श्रावण के प्रथम सोमवार से 16 सोमवार का व्रत प्रारंभ करती हैं व शिव-पार्वती से अपने लिए अनुकूल वर प्राप्ति की प्रार्थना करती हैं।
श्रावण माह का महत्व
देवी पार्वती ने भगवान शिव को पतिरूप में पाने के लिए कठोर व्रत,उपवास करके भगवान शिव को श्रावण माह में ही पुनः पाया। श्री विष्णु,ब्रह्मा,इंद्र,शिवगण आदि सभी श्रावण में पृथ्वी पर ही वास करते हैं और सभी अलग-अलग रूपों में अनेकों प्रकार से शिव आराधना करते हैं। श्रावण में शिव की अर्चना करने से धरती पर भी सभी दुखों का शमन होता है। ऐसा माना जाता है कि इस माह में की गयी शिव पूजा तत्काल शुभ फलदायी होती है। इसके पीछे स्वयं शिव का ही वरदान है। इस माह में दैहिक,दैविक और भौतिक तापों का नाश करने वाले शंकरजी की भक्तिपूर्वक पूजा करने से सभी मनोकामनाएं शीघ्र पूरी होती हैं। श्रावण मास में शिव भक्त ज्योतिर्लिंगों का दर्शन एवं जलाभिषेक करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त करता है तथा शिवलोक को पाता है।
क्यों अर्पण की जाती हैं शिवजी को ये चीजें
समुद्र मंथन के समय जब कालकूट नामक विष निकला तो उसके ताप से सभी देवता-राक्षस भयभीत हो गए एवं तीनों लोकों में घोर संकट छा गया। लोक कल्याण के लिए शिव ने इस विष का पान कर लिया और उसे अपने गले में ही रोक लिया जिसके प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नील कंठ कहलाये। लेकिन विष के ताप से व्याकुल शिव तीनों लोको में भ्रमण करने लगे पर उन्हें कहीं भी शांति नहीं मिली। अंत में वे पृथ्वी पर आए और पीपल के वृक्ष के पत्तों को हिलता हुआ देख उसके नीचे बैठ गए जहां उन्हें कुछ शांति मिली।
शिव के साथ ही सभी देवी-देवता उस पीपल वृक्ष में अपनी शक्ति समाहित कर भोलेनाथ को शीतल छाया और जीवन दायिनी वायु प्रदान करने लगे। चंद्रदेव ने अपनी पूर्ण शक्ति से शिवजी को शीतलता दी। शेषनाग,शिव के कंठ में लिपटकर उस कालकूट विष के दाहकत्व को कम करने में लग गए। इंद्रदेव और गंगाजी निरंतर उनके शीश पर जलवर्षा करने लगे। यह जानकर कि जहर ही जहर के असर को कम कर सकता है सभी देवता भांग,धतूरा,बेलपत्र आदि भोलेनाथ को खिलाकर उनके विष के ताप को कम करने का प्रयत्न करने लगे जिससे शिवजी को शांति मिली। इस प्रकार श्रावण माह की समाप्ति तक शिवजी पृथ्वी पर ही रहे। शिव ने चन्द्रमा,पीपल वृक्ष,शेषनाग आदि सभी को वरदान दिया,कि इस माह में जो भी प्राणी मुझे जल,गंगाजल,बेलपत्र,पुष्प,भांग,धतूरा,दूध आदि अर्पित करेगा उसे संसार के तीनों प्रकार के कष्टों (दैहिक,दैविक,भौतिक)से मुक्ति मिलेगी साथ ही उसे मेरे लोक की प्राप्ति भी होगी।