हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। यह तिथि भगवान श्रीगणेश को समर्पित होती है, जिन्हें विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता और प्रथम पूज्य देवता माना गया है। विशेष रूप से आषाढ़ मास की संकष्टी चतुर्थी अत्यंत शुभ और फलदायी मानी जाती है क्योंकि यह वर्षा ऋतु के प्रारंभ में आती है, जब वातावरण शुद्ध और आध्यात्मिक साधना के अनुकूल होता है। इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखकर गणपति बप्पा की आराधना करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
संकष्टी चतुर्थी का महत्व
‘संकष्टी’शब्द का अर्थ है‘संकटों का नाश करने वाली’। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने सबसे पहले यह व्रत अपने पुत्र गणेश जी की दीर्घायु और कल्याण के लिए किया था। तभी से यह व्रत जनमानस में प्रचलित हुआ और इसे करने से भक्तों को सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है। यह व्रत विशेष रूप से संतान की भलाई, मानसिक शांति, सफलता और बाधा निवारण के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।
गणेश जी की पूजा का महत्व
भगवान गणेश को सभी कार्यों की शुरुआत में पूजने की परंपरा है, क्योंकि वे विघ्नों को दूर कर कार्यों को सिद्ध करते हैं। संकष्टी चतुर्थी के दिन गणपति की पूजा करने से जीवन की हर बाधा सरल हो जाती है। इस दिन उन्हें दूर्वा, लाल फूल, सिंदूर और मोदक अर्पित करने का विशेष महत्व है। उनका ध्यान और जप करने से व्यक्ति में आत्मबल, विवेक और सकारात्मकता का विकास होता है।
चंद्र देव की पूजा का महत्व
संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा का भी विशेष पूजन किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने से मानसिक तनाव दूर होता है और मन शांत रहता है। चंद्रमा को जल, दूध, अक्षत और पुष्प अर्पित करने से चित्त की स्थिरता बढ़ती है और भावनात्मक संतुलन प्राप्त होता है। विशेष रूप से इस दिन चंद्र दर्शन को अत्यंत शुभ माना गया है।
पूजा विधि
इस दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और घर के पूजन स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें। फिर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर उन्हें दूर्वा, लाल फूल, अक्षत, सिंदूर और धूप-दीप अर्पित करें। मोदक या गुड़-चने का भोग लगाएं। इसके बाद श्रद्धापूर्वक “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का 108 बार जप करें और गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करें। संध्या के समय चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें दूध, जल, चंदन, अक्षत और पुष्प से अर्घ्य दें तथा उनका ध्यान कर व्रत का पारण करें।
लाभदायक उपाय
- श्रीगणेश को 21 दूर्वा चढ़ाएं, इससे आयु और ऐश्वर्य बढ़ता है।
- मोदक का भोग लगाएं, यह आर्थिक लाभ में सहायक होता है।
- चंद्रमा को दूध-जल से अर्घ्य दें, इससे मानसिक शांति मिलती है।
- गणेश मंदिर में दीपक जलाएं, विघ्न दूर होते हैं।