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नवरात्रि 2018 : माता का उपवास रखते समय इन बातों का जरूर रखें ध्यान

Sun, 14 Oct 2018 09:10 AM IST
डॉ. प्रणव पण्ड्या
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navratri 2018
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नवरात्र साधना का एक प्रधान अंग है- उपवास। उपवास से साधक की नैतिक और आध्यात्मिक उन्नति होती है, उसकी बुद्धि और विवेक जाग्रत् होती है। यह देखकर ही हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने नवरात्र साधना के अन्तर्गत उपवास को विशेष स्थान दिया है।

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साधना काल में उपवास
वर्ष में दो बार आने वाली नवरात्र साधना में उपवास का विशेष महत्व है। उपवास से अन्नमय कोष की सफाई हो जाती है। जिससे साधक को साधना काल में कम से कम व्यवधान आता है। हिन्दू धर्म की मान्यता है कि उपवास से साधक की आंतरिक शुद्धि के साथ आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

उपवास की महत्ता
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के संरक्षण अभिवर्धन के रहस्य छिपे पड़े हैं। उपवास शरीर की एक वैसी ही आवश्यकता है, जैसी श्रम के साथ विश्राम की। किसी मशीन को निरन्तर चलाया जाय तो वह जल्दी ही नष्ट हो जायगी। इसके विपरीत यदि बीच-बीच में उसे विश्राम देते रहा जाय तो कहीं अधिक समय तक काम करत रहेगी। साप्ताहिक अवकाश का नियम इसीलिए बनाया गया है कि एक दिन छुट्टी मनाने के बाद अधिक उत्साह पूर्वक काम कर सकना संभव हो सके। रात को यदि सोया न जाय तो थकान घेर लेगी और अनवरत श्रम करने पर जो लाभ सोचा गया था, वह न मिल सकेगा। ठीक यही बात पेट पर लागू होती है। उससे निरन्तर काम लिया जाय, कभी अवकाश न दिया जाय तो पाचन-यन्त्र खराब होने लगेंगे। उपवास करने वालों की तुलना में नित्य खाते रहने वाले नफे में नहीं, नुकसान में रहते हैं।
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भिन्न-भिन्न धर्म में उपवास
हिन्दू धर्म में प्रत्येक पन्द्रह दिन पश्चात् व्रत का विधान रखा गया है, एकादशी, प्रदोष, भिन्न-भिन्न पुण्य तिथियों तथा पर्वों पर उपवास किया जाता है। जैन धर्म में बहुकाल व्यापी उपवासों का विधान है। जैनियों के उपवास सप्ताहों और महीनों तक चलते हैं। यहूदी अपने सातवें महीने के दसवें दिन उपवास रखते हैं। ईसा की पाँचवी शताब्दी से पूर्व, महात्मा सुकरात ने उन दिनों यूनान में प्रचलित उपवासों का जिक्र किया है। रोमन जाति के व्यक्ति ईस्टर से पूर्व तीन सप्ताहों में शनिवार और रविवार के अतिरिक्त अन्य दिनों में उपवास किया करते थे। महात्मा ईसा ने स्वयं एक बार चालीस दिन और चालीस रात्रियों का उपवास किया था। योरोप में जब पापों का प्रभाव बढ़ा, तो उपवासों को विशेष महत्त्व प्रदान किया गया। मुसलमान, रमजान के महीने में अपने धर्म-ग्रन्थों के अनुसार तीस दिन तक रोजे रखते हैं। उपवास से शरीर, मन तथा आत्मा पर लाभदायक प्रभाव को देखकर ही उसे धर्म के अन्तर्गत स्थान दिया गया है।

उपवास का इतिहास
देवों की भूमि भारतवर्ष के प्राचीन ऋषि-मुनियों की तपस्या का उपवास, एक प्रधान अंग था। बड़े-बड़े धर्माचार्य स्वयं कई-कई दिनों तक उपवास करके, अपने अनुयायियों और भक्तों को उसका लाभ बतलाते थे। आजकल जो लोग धार्मिक दृष्टि से उपवास करते हैं, प्रायः सभी देशों में उन्हें धर्मांध बतलाया जाता है और उसकी हँसी उड़ाई जाती है। इसका कारण यही है कि आजकल लोग प्राकृतिक नियमों से एकदम अनभिज्ञ हो गये हैं। जो लोग अन्न को ही प्राण समझते हैं, उन्हें वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उपवास पर अपना विचार बदल लेना चाहिए।

उपवास से बढ़ती क्षमता
उपवास हमारी संस्कृति में प्रारंभ से ही उपवास को विशेष महत्व दिया जाता रहा है, साप्ताहिक व्रत, एकादशी, शिवरात्रि, नवरात्र व्रत आदि रूपों में लोग उपवास द्वारा अपने इष्टदेव की कृपा-प्राप्ति का यत्न करते रहे हैं लेकिन इस तथ्य से बहुत कम ही लोग अवगत होंगे कि उपवास शरीर को निरोग और निर्विकार रखने का भी एक सर्वश्रेष्ठ उपाय है। उपवास द्वारा शरीर के आंतरिक अंग-अवयवों को विश्राम मिल जाता है, जिससे इनकी कार्यक्षमता बढ़ती है। शारीरिक विषाक्त पदार्थ नष्ट होते हैं तथा कई प्रकार के रोग-विकारों का भी निवारण होता है।
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लेखक - अखिल विश्व गायत्री परिवार व देव संस्कृति विश्वविद्यालय कुलाधिपति हैं।

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