रविवार, 25 जनवरी को रथ सप्तमी है। इस बार रथ सप्तमी माघ महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि पर पड़ रही है। धार्मिक मान्यता है कि रथ सप्तमी पर ग्रहों के राजा और प्रत्यक्ष देवता सूर्यदेव अपने रथ पर सवार होकर उत्तर दिशा की ओर अपनी यात्रा को शुरू करते हैं। रथ सप्तमी पर सूर्यदेव की पूजा-आराधना और दान का विशेष महत्व होता है। रथ सप्तमी के बाद से शीत ऋतु का प्रभाव कम होने लगता है। रथ सप्तमी से मौसम में परिवर्तन का संकेत होता है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को रथ सप्तमी, अचला सप्तमी या आरोग्य सप्तमी के नाम से जाना जाता है। इस बार रथ सप्तमी रविवार के दिन पड़ने के कारण इसका महत्व काफी बढ़ गया है। हिन्दू पंचाग के अनुसार रथ सप्तमी सूर्योपासना का दिन है। इस दिन सूर्य देव की पूजा करे से मान-सम्मान, सुख समृद्धि, ऐश्वर्य और आरोग्यता की प्राप्ति होती है।
रथ सप्तमी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, रथ सप्तमी पर भगवान सूर्य की पूजा करने से लोगों को अक्षय फल की प्राप्ति होती है। जो भक्त श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ सूर्यदेव की पूजा करता है उससे सूर्यदेव प्रसन्न होकर अपने भक्तों को सुख, समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद देते हैं। सूर्य की पूजा, जल अर्पित करने और सूर्य स्तुति करने से त्वचा रोग आदि नष्ट हो जाते हैं और आंखों की ज्योति बढ़ती है और साथ ही मान-सम्मान में इजाफा होता है।
सूर्य सप्तमी व्रत पूजन विधि और मंत्र
रथ सप्तमी पर सूर्योदय से पहले उठें और स्नान करके तांबे के लोटे में जलभर उसमें लाल फूल, अक्षत और रोली डालकर पूर्व दिशा में खड़े होकर उगते हुए सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करें। अर्घ्य देते हुए सूर्यदेव से जुड़े मंत्रों का जाप करें। सूर्य को जल चढ़ाने के बाद लाल आसन पर बैठकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके इस मंत्र का 108 बार जाप करें। ऐसा करने से आपको सूर्य देव का आशीर्वाद मिलेगा।
''एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
करुणामयी माता, गृहस्थभक्ति, दिवाकर।''
रविवार और रथ सप्तमी के शुभ योग में पूजा के नियम
रविवार का दिन सूर्यदेव की पूजा के लिए समर्पित होता है ऐसे में रथ सप्तम के दिन दान करने का विशेष महत्व होता है। इस दिन जरूरतमदों, गरीबों और ब्राह्मणों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरत की चीजे दान करें। देनी। रथ सप्तमी के दिन सूर्य उपासना करने वालों के लिए एक समय नमक रहित भोजन अथवा फलाहार करने का विधान है।
रथ सप्तमी व्रत कथा
रथ सप्तमी के लेकर एक कथा है। भविष्य पुराण की पौराणिक कथा के अनुसार एक वैश्या ने अपने जीवन में कभी कोई दान-पुण्य नहीं किया। बुढ़ापे में जब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह ऋषि वशिष्ठ के पास गईं। उसने ऋषि के समक्ष अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। तब वशिष्ठ जी ने उन्हें रथ सप्तमी यानी अचला सप्तमी के व्रत का महत्व बताते हुए कहा कि इस दिन यदि कोई व्यक्ति सूर्य को जल अर्घ्य देकर भगवान सूर्य को दीप दान करता है तो उसे बहुत पुण्य मिलता है। वैश्या ने ऋषि के कहे अनुसार रथ सप्तमी का व्रत किया, जिसके प्रभाव से शरीर त्यागने के बाद उसे इंद्र की अप्सराओं की मुखिया बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।