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Raksha Bandhan 2020: सावन सोमवार और सर्वार्थ सिद्धि शुभ योग में रक्षाबंधन, सुबह इतने बजे तक रहेगी भद्रा

Mon, 03 Aug 2020 06:21 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

  • इस बार राखी पर भद्राकाल का भय भी नहीं रहेगा और ये पर्व सभी भाई-बहनों के लिए परम कल्याणकारी रहेगा। 
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Raksha Bandhan 2020
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विस्तार
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3 अगस्त को रक्षा बंधन का त्योहार है। हिंदू पंचांग के अनुसार सावन महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर रक्षाबंधन मनाया जाता है। इस बार रक्षाबंधन पर शुभ योग बन रहा है। रक्षाबंधन पर सर्वार्थ सिद्धि योग नाम का बहुत ही शुभ योग है। ज्योतिष के अनुसार इस योग में अगर कोई भी शुभ कार्य किया जाता है कार्य बहुत ही जल्द सिद्धि हो जाता है। इसके अलावा रक्षाबंधन पर सावन महीने का अंतिम सोमवार भी है और सावन महीना इसी दिन खत्म हो जाएगा। इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा सुबह 9 बजकर 28 मिनट तक रहेगी इसके बाद पूरे दिन राखी बांधी जा सकेगी। 

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ज्योतिष में भद्रा 
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भद्रा एक विशेष समय होता है जिसमें किसी भी तरह का शुभ कार्य शुरू नहीं किया जाता है। अच्छे मुहूर्त अथवा भद्रा रहित काल में शुभ कार्य करने से पर कार्य में सिद्धि और विजय प्राप्ति होती है। वहीं कुछ का मानना है कि भद्रा शनिदेव की बहन हैं जिस कारण से उनका स्वभाव भी शनि की तरह क्रूर है ऐसे में भद्राकाल में किसी भी तरह का शुभ कार्य करना अच्छा नहीं रहता है। शास्त्रों में रक्षाबंधन का पावन कर्म भद्रा रहित समय में करने का विधान है। इस कारण से इस बार 3 अगस्त को भद्रा की समाप्ति के बाद ही राखी बांधे।



अच्छे मुहूर्त अथवा भद्रा रहित काल में भाई की कलाई में राखी बांधने से भाई को कार्य सिद्धि और विजय प्राप्त होती है। इस दिन चंद्रमा अपने ही नक्षत्र और मकर राशि में रहेंगे, इसलिए भद्रा का वास पाताल लोक में रहेगा, अतः इस बार भद्राकाल भय भी नहीं रहेगा और ये पर्व सभी भाई-बहनों के लिए परम कल्याणकारी रहेगा। 
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श्रावण पूर्णिमा- सावन महीने का अंतिम दिन
3 अगस्त को श्रावणी पूर्णिमा है। हर महीने की पूर्णिमा पर भगवान सत्यनारायण की कथा सुनी जाती है। पूर्णिमा के दिन जब चन्द्र अपनी सम्पूर्ण कलाओं और सहस्रों शीतल रश्मियों से संसार को आच्छादित कर देते हैं और माँ महालक्ष्मी पाताल लोक के राजा बलि के यहाँ से बलि को रक्षासूत्र बांधकर अपने पति श्रीहरि विष्णु को मुक्त करा लेती हैं तो भगवान शिव माँ शक्ति और गणों के साथ कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं।

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