व्रत का हिंदू धर्म में विशेष स्थान होता है। 21 मार्च को शनि प्रदोष का व्रत रखा जाएगा। हर महीने की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत रखा जाता है। जब यह प्रदोष व्रत शनिवार के दिन पड़ता है उसे शनि प्रदोष व्रत कहते हैं। शास्त्रों में शनि प्रदोष का विशेष महत्व होता है। शनि प्रदोष व्रत में शनि भगवान की पूजा होती है। जिन जातकों की कुंडली में शनि से संबंधित किसी तरह का दोष रहता है उनके लिए यह व्रत दोषों को दूर करने में मदद मिलती है। शनि प्रदोष व्रत में शनि देव को प्रसन्न करने के लिए काला तिल, काले कपड़े, सरसों का तेल, उड़द दाल अर्पित की जाती है।
प्रदोष व्रत भगवान शिव और पार्वती की पूजा से जुड़ा व्रत का फल प्रत्येक वार के हिसाब से अलग-अलग मिलता है। आइए दिनों के अनुसार जानते हैं प्रदोष व्रत का फल
सोमवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को सोम प्रदोषम् या चन्द्र प्रदोषम् भी कहा जाता है। इस दिन साधक अपनी अभीष्ट कामना की पूर्त्ति के लिए शिव की साधना करता है।
मंगलवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को भौम प्रदोषम् कहा जाता है और इसे विशेष रूप से अच्छी सेहत और बीमारियों से मुक्ति की कामना से किया जाता है।
बुधवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को बुध प्रदोष व्रत कहते हैं। इस दिन किया जाने वाला प्रदोष व्रत सभी प्रकार की कामनाओं को पूरा करने वाला होता है।
गुरुवार के दिन किया जाने वाला व्रत गुरु प्रदोष व्रत कहते हैं। इस दिन शत्रुओं पर विजय पाने और उनके नाश के लिए इस पावन व्रत को किया जाता है।
शुक्रवार के दिन पड़ने वाले व्रत को शुक्र प्रदोष व्रत कहते हैं। इस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत से सुख-समृद्धि और सौभाग्य का वरदान मिलता है।
शनिवार के दिन किये जाने वाले प्रदोष व्रत को शनि प्रदोषम् कहा जाता है। इस दिन इस पावन व्रत को पुत्र की कामना से किया जाता है।
रविवार के दिन किया जाने वाला प्रदोष व्रत लंबी आयु और आरोग्य की कामना से किया जाता है।
प्रदोष व्रत की पूजा विधि
प्रदोष व्रत करने के लिए जल्दी सुबह उठकर सबसे पहले स्नान करें और भगवान शिव को जल चढ़ाकर भगवान शिव का मंत्र जपें। इसके बाद पूरे दिन निराहार रहते हुए प्रदोषकाल में भगवान शिव को शमी, बेल पत्र, कनेर, धतूरा, चावल, फूल, धूप, दीप, फल, पान, सुपारी आदि चढ़ाएं।