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Parivartini Ekadashi 2022 : परिवर्तनी एकादशी आज, जानिए पूजाविधि, महत्व, कथा और शुभमुहूर्त

Tue, 06 Sep 2022 08:45 AM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन ,वास्तुविद

सार

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी,जलझूलनी या पद्मा एकादशी के नाम से भी जानते हैं। शास्त्रों में उल्लेख आता है कि इस तिथि को भगवान विष्णु चतुर्मास के शयन के दौरान शेषशैय्या पर अपनी करवट बदलते हैं।
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परिवर्तिनी एकादशी: पद्मा एकादशी के विषय में शास्त्र कहता है कि इस दिन चावल, दही एवं चांदी का दान करना उत्तम फलदायी होता है। जो लोग किसी कारणवश पद्मा एकादशी का व्रत नहीं कर पाते हैं उन्हें पद्मा एकादशी के दिन भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों की कथा का पाठ करना चाहिए। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सनातन धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व है। यह तिथि भगवान विष्णु की उपासना के लिए समर्पित होती है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी,जलझूलनी या पद्मा एकादशी के नाम से भी जानते हैं। शास्त्रों में उल्लेख आता है कि इस तिथि को भगवान विष्णु चतुर्मास के शयन के दौरान शेषशैय्या पर अपनी करवट बदलते हैं। यानी भगवान विष्णु की शयन अवस्था में परिवर्तन होता है। इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।
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परिवर्तिनी एकादशी महत्व
शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु करवट बदलने के समय प्रसन्न मुद्रा में रहते हैं,इस अवधि में भक्तिभाव एवं विनयपूर्वक उनसे जो कुछ भी मांगा जाता है वे अवश्य प्रदान करते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के वामन रूप कि पूजा की जाती है। इस व्रत को करने से व्यक्ति के सुख,सौभाग्य में वृद्धि होती है। एक मान्यता के अनुसार इस दिन माता यशोदा ने जलाशय पर जाकर अपने कान्हा के वस्त्र धोए थे,इसी कारण इसे जलझूलनी एकादशी भी कहा जाता है। परिवर्तिनी एकादशी को सभी दुखों से मुक्ति दिलाने वाली माना जाता है। इस दिन व्रत करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। जो मनुष्य इस एकादशी को भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करता है वो तीनों लोक की पूजा कर लेता है।

पूजाविधि
इस दिन सुबह स्नान आदि से निवृत होकर भगवान विष्णु के वामन अवतार को ध्यान करते हुए उन्हें पचांमृत (दही, दूध, घी, शक्कर,शहद) से स्नान करवाएं। इसके पश्चात गंगा जल से स्नान करवा कर भगवान विष्णु को कुमकुम-अक्षत लगायें। वामन भगवान की कथा का श्रवण या वाचन करें और दीपक से आरती उतारें एवं प्रसाद सभी में वितरित करें। भगवान विष्णु के पंचाक्षर मंत्र ‘‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’’ का यथा संभव तुलसी की माला से जाप करें। इसके बाद शाम के समय भगवान विष्णु के मंदिर अथवा उनकी मूर्ति के समक्ष भजन-कीर्तन का कार्यक्रम करें।इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु सहित देवी लक्ष्मी की पूजा करने से इस जीवन में धन और सुख की प्राप्ति तो होती ही है। परलोक में भी इस एकादशी के पुण्य से उत्तम स्थान मिलता है। पद्मा एकादशी के विषय में शास्त्र कहता है कि इस दिन चावल, दही एवं चांदी का दान करना उत्तम फलदायी होता है। जो लोग किसी कारणवश पद्मा एकादशी का व्रत नहीं कर पाते हैं उन्हें पद्मा एकादशी के दिन भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों की कथा का पाठ करना चाहिए। विष्णु सहस्रनाम एवं रामायण का पाठ करना भी इस दिन उत्तम फलदायी होता है।
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व्रत की कथा
पुराणों के अनुसार बलि नामक एक दैत्य था उसने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था। लेकिन वह अपने द्वार पर आए किसी भी याचक को कभी भी निराश नहीं करता था। एक बार भगवान विष्णु ने राजा बलि की परीक्षा ली। वामन रूप में भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग जमीन देने का वचन मांग लिया। भगवान विष्णु ने दो पग में समस्त लोकों को नाप लिया। जब तीसरे पग के लिए कुछ नहीं बचा तो राजा बलि ने अपना वचन पूरा करने के लिए अपना सिर वामन ब्राह्राण के पैर के नीचे रख दिया।भगवान, राजा बलि की इस भावना से बेहद प्रसन्न हुए और उन्हें पाताल लोक का राजा बना दिया।बलि के पुत्र विरोचन के कहने पर भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन बलि के आश्रम पर भगवान वामन की मूर्ति स्थापित की गई।
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शुभमुहूर्त
पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 6 सितंबर, मंगलवार की सुबह 05.54 से शुरू होकर रात लगभग 3 बजे तक रहेगी।
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