makar sankranti 2019 इन दिनों अर्थात विक्रम की इक्कीसवीं शताब्दी में मकर संक्रांति का पर्व जनवरी महीने के चौदहवें या पंद्रहवें दिन आता है। सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है, तब मकर संक्रांति होती है। यह कहना गलत है कि सूर्य इसी दिन उत्तरायण भी होता है। तथ्य यह है कि उत्तरायण का प्रारंभ 21-22 दिसंबर को होता है। लगभग अठारह सौ साल पहले ग्रह गणित के कारण संक्रांति और उत्तरायण स्थिति एक ही समय होती थी। शायद इसी वजह से कुछ जगह संक्रांति और उत्तरायण को एक ही समझा जाता है।
उदाहरण के लिए तमिलनाडु में इसे पोंगल के रूप में मनाते हैं। कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे सिर्फ संक्रांति कहते हैं। गोआ, ओडिशा, हरियाणा, बिहार, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, और जम्मू आदि प्रांतों में मकर संक्रांति कहते हैं। हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में एक दिन पूर्व 13 जनवरी को ही मनाया जाता है। पौष संक्रांति, मकर संक्रमण आदि भी कुछ प्रसिद्ध नाम हैं।
देवताओं का दिन है उत्तरायण
उत्तरायण काल को ऋषि मुनियों ने जप, तप और सिद्धि प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण माना है। इसे देवताओं का दिन माना जाता है। गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा है कि उत्तरायण के छह माह में पृथ्वी प्रकाशमय होती है। इसके अलावा उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि माना गया है। भावात्मक रूप से उत्तरायण शुभ और प्रकाश का प्रतीक है, तो दक्षिणायन कंलक कालिमा का मार्ग मानते हैं। श्रीकृष्ण ने इसे पुनरावृत्ति देने वाला धूम्र मार्ग वाला कहा है
मकर सक्रांति पर भीष्म पितामह ने त्यागा था शरीर
भीष्म पितामह
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महाभारत काल के दौरान भीष्म पितामह जिन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। उन्होंने भी मकर संक्रांति के दिन शरीर का त्याग किया था। एक अन्य कथा के अनुसार, महाराजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के तर्पण के लिए वर्षों की तपस्या करके गंगा जी को पृथ्वी पर आने के लिए बाध्य कर दिया था और मकर संक्रांति पर ही भगीरथ ने अपने पूर्वजों का तर्पण किया था।
सूर्यदेव की उपासना, आराधना एवं पूजन कर, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की जाती है। सामान्यत: भारतीय पंचांग पद्धति की समस्त तिथियां चंद्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित की जाती हैं, किंतु मकर संक्रांति को सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है।
इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलते हैं
ऋषियों ने गाया भी है। सूर्य: आत्मा जगतुस्थ अर्थात सूर्य जगत की उदित होती हुई आत्मा है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनि से मिलने उसके घर जाते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है।
दान का महत्व
मान्यता है कि उत्तरायण के समय दिया गया दान सौ गुना बढ़कर फिर मिलता है। इस समय सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किंतु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है।