Mahashivratri 2026: फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि भगवान शिव की आराधना का सबसे पावन पर्व माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस रात्रि शिवजी का ज्योतिर्लिंग स्वरूप प्रकट हुआ था और इसी दिन उनका विवाह माता पार्वती से भी हुआ। इस दिन शिवलिंग पर जलाभिषेक करने से समस्त पापों का नाश और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। मान्यता है कि शिवजी ऐसे भोलेभंडारी हैं उन पर श्रद्धा से अर्पित किया हुआ एक लोटा जल भी प्राणी की सभी समस्याओं का हल कर देता है। लेकिन शास्त्रों के अनुसार यदि जल चढ़ाने की विधि में त्रुटि हो जाए तो पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। इसलिए शिवलिंग पर जल अर्पित करने से पहले कुछ महत्वपूर्ण नियम जान लेना आवश्यक है।
4. जल चढ़ाते समय मंत्रोच्चार
सिर्फ जल चढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। जलाभिषेक करते समय “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप अवश्य करें। इसके अलावा महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी विशेष फलदायी माना गया है। मंत्रों के साथ किया गया अभिषेक मन और आत्मा को शुद्ध करता है।
5. बेलपत्र और अन्य सामग्री का नियम
जल चढ़ाने के बाद शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करें। बेलपत्र तीन पत्तों वाला और बिना टूटा हुआ होना चाहिए। ध्यान रखें कि बेलपत्र उल्टा न रखें। इसके साथ धतूरा, आक का फूल और भस्म भी अर्पित की जा सकती है।
6. तुलसी न चढ़ाएं
वैष्णव परंपरा में पूजित तुलसी माता को शिवलिंग पर नहीं चढ़ाया जाता। शास्त्रों में इसे वर्जित बताया गया है।
7. जलाभिषेक का आध्यात्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता है कि शिवलिंग पर जल अर्पित करना मन की तपन और जीवन की कठिनाइयों को शांत करने का प्रतीक है। जैसे जल अग्नि को शांत करता है, वैसे ही शिवाभिषेक जीवन के कष्टों को शीतल करता है। महाशिवरात्रि की रात्रि में चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व है। प्रत्येक प्रहर में जलाभिषेक करने से शिवजी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
अंत में यही ध्यान रखें कि पूजा बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि श्रद्धा और शुद्ध भाव से पूर्ण होती है। नियमों का पालन करें, मंत्रोच्चार करें और मन, वचन व कर्म से पवित्र रहकर भोलेनाथ की आराधना करें। तभी महाशिवरात्रि का व्रत और जलाभिषेक पूर्ण फल प्रदान करेगा।